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October 21, 2026
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राहुल और जर्मन चांसलर के स्वागत पर सियासी घमासान, प्राथमिकता को लेकर सरकार पर सवाल

कर्नाटक में एक ही दिन दो बड़े राजनीतिक और कूटनीतिक घटनाक्रम हुए, लेकिन इन्हीं घटनाओं ने राज्य की राजनीति में नया विवाद भी खड़ा कर दिया। कांग्रेस सांसद राहुल गांधी और जर्मनी के चांसलर फ्रेडरिक मर्ज के आगमन के बाद उनके स्वागत को लेकर राजनीतिक बहस तेज हो गई। विपक्षी भाजपा ने राज्य की कांग्रेस सरकार पर आरोप लगाया कि उसने राज्य की वैश्विक छवि और कूटनीतिक महत्व से ज्यादा अपने “हाईकमान” को खुश करने को प्राथमिकता दी।

दरअसल, जर्मनी के चांसलर फ्रेडरिक मर्ज दो दिवसीय आधिकारिक यात्रा पर भारत आए थे। यह चांसलर बनने के बाद उनकी भारत और एशिया की पहली आधिकारिक यात्रा थी। दौरे का मकसद भारत-जर्मनी रणनीतिक साझेदारी को और मजबूत करना था। पहले दिन उन्होंने अहमदाबाद में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात की। इस मुलाकात में व्यापार, निवेश, हरित ऊर्जा, तकनीक और वैश्विक मुद्दों पर सहयोग बढ़ाने को लेकर द्विपक्षीय बातचीत हुई।

दूसरे दिन चांसलर मर्ज बेंगलुरु पहुंचे, जहां उन्होंने उद्योग और तकनीक से जुड़े कार्यक्रमों में हिस्सा लिया और जर्मन कंपनियों के प्रतिनिधियों से मुलाकात की। इस दौरान भारत में निवेश और तकनीकी सहयोग के अवसरों पर जोर दिया गया।

इसी दिन राहुल गांधी तमिलनाडु जाते समय मैसूर एयरपोर्ट पर थोड़ी देर के लिए रुके। उनके स्वागत के लिए कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया और उपमुख्यमंत्री डीके शिवकुमार खुद एयरपोर्ट पहुंचे। इसी बात को लेकर भाजपा ने कड़ा विरोध दर्ज कराया। भाजपा का कहना है कि जब दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था जर्मनी के चांसलर राज्य आए, तब मुख्यमंत्री और उपमुख्यमंत्री का उनके स्वागत में न होना राज्य की वैश्विक छवि के लिए गलत संदेश देता है।

भाजपा ने आरोप लगाया कि राज्य सरकार ने अंतरराष्ट्रीय मेहमान की बजाय अपने पार्टी नेतृत्व को प्राथमिकता दी। कर्नाटक विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष आर अशोक ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर दोनों स्वागत की तस्वीरें साझा करते हुए लिखा कि यह “मिसप्लेस्ड प्रायोरिटी” और “मिस्ड अपॉर्च्युनिटी” है। उनके मुताबिक जर्मन चांसलर का दौरा राज्य के लिए निवेश, उद्योग, रोजगार और दीर्घकालिक विकास का बड़ा अवसर था, लेकिन सरकार ने उसे पूरी गंभीरता से नहीं लिया।

आर अशोक ने कहा कि जर्मनी जैसे देश के राष्ट्राध्यक्ष का स्वागत करना राज्य के सम्मान और वैश्विक प्रतिष्ठा से जुड़ा मामला है। उन्होंने आरोप लगाया कि राजनीतिक वफादारी और हाईकमान को खुश करने की कोशिश में राज्य के हितों को पीछे रखा गया। भाजपा नेताओं ने इसे पूरे कर्नाटक का अपमान बताया।

वहीं कांग्रेस की ओर से इस मुद्दे पर सफाई भी दी गई। पार्टी नेताओं का कहना है कि जर्मन चांसलर का औपचारिक स्वागत संबंधित मंत्री और वरिष्ठ अधिकारी कर रहे थे, जबकि राहुल गांधी पार्टी के वरिष्ठ नेता हैं और उनका स्वागत करना भी राजनीतिक दृष्टि से जरूरी था। सरकार का तर्क है कि दोनों कार्यक्रमों की व्यवस्थाएं अलग-अलग स्तर पर की गई थीं और इससे राज्य के सम्मान पर कोई आंच नहीं आती।

फिर भी यह विवाद केवल स्वागत तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसने राजनीति और कूटनीति के संतुलन पर बहस छेड़ दी है। एक तरफ राज्य में सत्तारूढ़ दल अपने शीर्ष नेताओं को प्राथमिकता देता दिखा, तो दूसरी तरफ विपक्ष ने इसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर राज्य की छवि से जोड़कर बड़ा मुद्दा बना दिया।

जर्मन चांसलर के दौरे को लेकर उद्योग जगत में उम्मीद थी कि इससे कर्नाटक में निवेश और तकनीकी सहयोग के नए रास्ते खुलेंगे। लेकिन स्वागत को लेकर उठा विवाद इन सकारात्मक पहलुओं से ज्यादा चर्चा में आ गया। अब सवाल यही है कि क्या राज्य सरकार भविष्य में ऐसे अंतरराष्ट्रीय दौरों को ज्यादा गंभीरता और प्राथमिकता के साथ देखेगी या फिर राजनीतिक प्राथमिकताएं ही हर बार आगे रहेंगी।

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