छत्तीसगढ़ में समाज कल्याण विभाग से जुड़ा एक बड़ा NGO घोटाला सामने आया है, जिसने शासन-प्रशासन की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। यह घोटाला करीब 14 वर्षों से चल रहा था, जिसमें बिना किसी मान्यता के NGO के माध्यम से करोड़ों रुपये की हेराफेरी की गई।
इस घोटाले का खुलासा तब हुआ जब समाज कल्याण विभाग के संविदा कर्मचारी कुंदन ठाकुर ने अपनी नौकरी को नियमित कराने के लिए आवेदन दिया। इसी दौरान उन्हें पता चला कि उनके नाम से किसी दूसरी जगह पर सहायक ग्रेड-2 पद पर भी वेतन जारी किया जा रहा है। संदेह होने पर कुंदन ने RTI लगाई और जांच में पाया कि रायपुर और बिलासपुर में कुल 30 कर्मचारी ऐसे हैं, जिनके नाम पर दो-दो जगह वेतन निकल रहा है।
जब कुंदन ने इस घोटाले का पर्दाफाश करने की कोशिश की तो विभाग ने उनके खिलाफ कार्रवाई करते हुए नौकरी से निकाल दिया। लेकिन मामला यहीं नहीं रुका। कुंदन द्वारा की गई शिकायत के बाद यह मामला CBI तक पहुंचा, जिसने अब तेजी से जांच शुरू कर दी है।
CBI अधिकारियों ने समाज कल्याण विभाग के दफ्तर पर पहुंचकर तीन बंडल दस्तावेजों की फोटोकॉपी ली है। अधिकारियों का कहना है कि इन दस्तावेजों की जांच के बाद आगे की कार्रवाई की जाएगी। अब तक की जांच में एक मंत्री और 7 IAS अधिकारियों समेत 14 लोगों के नाम सामने आए हैं।
जांच से पता चला है कि यह NGO वर्ष 2004 में उस समय की समाज कल्याण मंत्री रेणुका सिंह और वरिष्ठ अधिकारियों—विवेक ढांढ, एम.के. राउत, आलोक शुक्ला, सुनील कुजूर, बी.एल. अग्रवाल, सतीश पांडे और पी.पी. श्रीवास्तव—द्वारा बनाया गया था। NGO का उद्देश्य दिव्यांगों की मदद करना बताया गया था, जिसके तहत ट्राइसाइकिल, व्हीलचेयर, सुनने की मशीनें और कृत्रिम अंग बांटे जाने थे।
लेकिन जांच में सामने आया कि यह संस्था केवल कागजों पर सक्रिय थी। वास्तविकता में कोई काम नहीं हुआ। बावजूद इसके, केंद्र और राज्य सरकार की योजनाओं के करोड़ों रुपये NGO के खातों में ट्रांसफर किए जाते रहे।
नियमों के अनुसार किसी भी सरकारी अधिकारी या कर्मचारी को NGO में शामिल होने की अनुमति नहीं होती, फिर भी इस संस्था में कई वरिष्ठ अधिकारी सदस्य बने। 17 सालों तक संस्था में न तो चुनाव हुए, न कोई प्रबंधन बैठक, और न ही ऑडिट कराया गया।
CBI अब इस पूरे मामले की गहन जांच कर रही है। माना जा रहा है कि आने वाले दिनों में कई वरिष्ठ अधिकारियों और नेताओं के खिलाफ बड़ी कार्रवाई हो सकती है। यह मामला छत्तीसगढ़ के अब तक के सबसे बड़े NGO घोटालों में से एक बन गया है।
