April 17, 2026
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“लोकसभा में डिप्टी स्पीकर पद खाली क्यों? खड़गे ने उठाई लोकतंत्र की अनदेखी पर आवाज़”

भारतीय लोकतंत्र की विशेषता इसकी संसदीय परंपराओं और संतुलन में निहित है। संसद के दोनों सदनों — लोकसभा और राज्यसभा — के सुचारू संचालन के लिए विभिन्न पदों की आवश्यकता होती है। इन पदों में “लोकसभा उपाध्यक्ष” (डिप्टी स्पीकर) का पद न केवल कार्य संचालन में सहायक होता है, बल्कि सत्ता और विपक्ष के बीच संतुलन बनाए रखने का भी प्रतीक है। लेकिन आश्चर्य की बात है कि यह महत्वपूर्ण पद लगातार दो लोकसभा कार्यकालों से रिक्त पड़ा है।

हाल ही में विपक्ष के नेता और कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को एक पत्र लिखकर इस मुद्दे पर गहरी चिंता जताई है। उन्होंने कहा कि यह लोकतांत्रिक परंपराओं का खुला उल्लंघन है कि इतने लंबे समय तक लोकसभा का उपाध्यक्ष नहीं चुना गया। खड़गे ने यह भी लिखा कि भारत के संसदीय इतिहास में यह पहली बार हुआ है जब लगातार दो कार्यकालों (2014 और 2019) से यह पद खाली है।

डिप्टी स्पीकर का चुनाव भारतीय संविधान के अनुच्छेद 93 के अंतर्गत आता है, जिसके अनुसार लोकसभा को अध्यक्ष और उपाध्यक्ष चुनना अनिवार्य है। परंतु जब से बीजेपी सत्ता में आई है, उन्होंने अध्यक्ष तो चुना, लेकिन उपाध्यक्ष के चुनाव को नज़रअंदाज़ कर दिया गया। यह परंपरा रही है कि यह पद आमतौर पर विपक्ष के खाते में जाता है ताकि सदन में संतुलन बना रहे। मगर विडंबना यह है कि लोकतंत्र की रक्षा करने वाली संस्था स्वयं ही लोकतांत्रिक मर्यादाओं को दरकिनार कर रही है।

खड़गे ने प्रधानमंत्री से अनुरोध किया है कि 2024 की नई लोकसभा की शुरुआत के साथ ही डिप्टी स्पीकर का चुनाव पारदर्शी तरीके से कराया जाए, ताकि जनता का लोकतंत्र में भरोसा बना रहे और संसद की कार्यवाही निष्पक्ष रूप से संचालित हो सके।

यह मुद्दा केवल एक पद भरने का नहीं, बल्कि संसदीय मर्यादा और नैतिक जिम्मेदारी का है। अगर संसद के अंदर ही लोकतंत्र के मूल सिद्धांतों की उपेक्षा होती है, तो यह देश के नागरिकों के बीच लोकतंत्र की विश्वसनीयता को कमजोर कर सकता है। संसद केवल सरकार चलाने का माध्यम नहीं, बल्कि वह स्थान है जहां विपक्ष की आवाज़ भी उतनी ही महत्वपूर्ण होती है जितनी कि सत्ता पक्ष की।

अतः डिप्टी स्पीकर का चुनाव अब केवल एक संवैधानिक औपचारिकता नहीं, बल्कि लोकतंत्र की विश्वसनीयता की परीक्षा बन गया है। यदि सरकार सच में ‘सबका साथ, सबका विकास’ की बात करती है, तो उसे यह सुनिश्चित करना चाहिए कि लोकतंत्र की प्रत्येक संस्था सम्मान और संतुलन के साथ चले, और डिप्टी स्पीकर का पद जल्द भरा जाए।

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