भारतनेट फेज-2 परियोजना में एक और बड़ा घोटाला सामने आया है, जिसने सरकारी योजनाओं की पारदर्शिता और जवाबदेही पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। इस प्रोजेक्ट के तहत टाटा प्रोजेक्ट्स लिमिटेड को छत्तीसगढ़ में ऑप्टिकल फाइबर नेटवर्क बिछाने का ठेका दिया गया था। लेकिन कंपनी ने तय समय सीमा में काम पूरा नहीं किया, जिसके चलते उस पर 12% का जुर्माना लगाया गया।
पहले तो यह जुर्माना हर बिल से काटा गया और करीब 28 करोड़ रुपये वसूल भी लिए गए। लेकिन बाद में अधिकारियों ने न सिर्फ टाटा से जुर्माना हटाया, बल्कि यह रकम भी वापस कर दी गई। यहीं से शुरू होती है एक नई कहानी।
मार्च 2019 में एक नई कंपनी बनाई गई — गैलेक्सी सेनर्जी प्राइवेट लिमिटेड (GSPL)। यह कंपनी सिर्फ छह महीने पुरानी थी, लेकिन उसे 10 हजार किलोमीटर ऑप्टिकल फाइबर लाइन बिछाने का बड़ा ठेका दे दिया गया। हैरानी की बात यह है कि इस कंपनी को टाटा प्रोजेक्ट्स से सीधे 275 करोड़ रुपये का भुगतान कर दिया गया।
सवाल यह उठता है कि आखिर इतनी बड़ी रकम और ज़िम्मेदारी एक नई कंपनी को किस आधार पर सौंपी गई? क्या यह पूरी योजना टाटा पर लगे जुर्माने से बचने के लिए बनाई गई थी?
