मध्य प्रदेश के युवाओं और बेरोज़गारों की आवाज़ दबाई नहीं जा सकती।
प्रदेश में पहले से ही सरकारी नौकरियों की भारी कमी है। वर्षों से युवा भर्ती परीक्षाओं का इंतज़ार करते हैं – कोई परीक्षा अधर में लटकती है, कोई इंटरव्यू सालों तक नहीं होता, और जहां रिज़ल्ट आता है, वहां नियुक्ति पत्र टलते रहते हैं।
अब जब शिक्षक वर्ग-3 की भर्ती निकली है, तो कर्मचारी चयन बोर्ड ने ऐसे मनमाने नियम बना दिए हैं जिससे हज़ारों योग्य युवा अपात्र हो गए हैं।
👉 डिग्री की शर्त बदलकर 1 अगस्त तक पूरी करना अनिवार्य कर दिया गया है, जबकि पहले काउंसलिंग तक डिग्री पूरी करना पर्याप्त होता था। इससे बीएड और डीएलएड के अंतिम वर्ष के हजारों छात्र बाहर हो गए हैं।
👉 संस्कृत और उर्दू जैसे भाषा विषयों को परीक्षा से बाहर कर दिया गया है, जिससे इन विषयों से TET पास करने वाले अभ्यर्थी भी अपात्र हो गए हैं।
👉 सिलेबस में भी परीक्षा से ठीक पहले बदलाव कर दिया गया, जो पूरी तरह से अनुचित है।
यह केवल नियमों में बदलाव नहीं है, यह युवाओं के सपनों और उनके अधिकारों पर कुठाराघात है।
मैं पूछता हूँ –
क्या यह सरकार चाहती है कि योग्य युवा निराश होकर घर बैठ जाएं?
क्या यह सरकार भाषा के आधार पर भेदभाव को बढ़ावा दे रही है?
क्या भर्ती प्रक्रिया को उलझाकर युवाओं को भ्रमित किया जा रहा है?
मैं सरकार से मांग करता हूँ:
1. शिक्षक भर्ती की शर्तें पहले की तरह की जाएं।
2. अंतिम वर्ष के विद्यार्थी परीक्षा में बैठ सकें।
3. संस्कृत और उर्दू को फिर से विकल्प में जोड़ा जाए।
4. सिलेबस में अचानक किए गए बदलाव तुरंत वापस लिए जाएं।
5. भर्ती प्रक्रिया को पारदर्शी, समयबद्ध और निष्पक्ष बनाया जाए।
