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September 6, 2026
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“मध्य प्रदेश को ‘एमपी’ कहने पर रोक की मांग खारिज, हाई कोर्ट ने कहा- कोई जनहित नहीं”

मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय, जबलपुर में एक अजीबो-गरीब जनहित याचिका दायर की गई, जिसमें याचिकाकर्ता ने राज्य के नाम “मध्य प्रदेश” को संक्षेप में “एमपी” या “म.प्र.” के रूप में लिखने और बोलने पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने की मांग की थी। याचिकाकर्ता का तर्क था कि राज्य के गौरव और सम्मान की रक्षा के लिए उसका पूरा नाम ही लिखा और बोला जाना चाहिए, न कि छोटा करके।

याचिका में यह भी मांग की गई थी कि सरकार को यह निर्देश दिए जाएं कि सभी सरकारी दस्तावेज़ों, संचार माध्यमों और नामपटों आदि में केवल “मध्य प्रदेश” लिखा जाए, किसी भी प्रकार का संक्षिप्तीकरण न किया जाए।

सुनवाई के दौरान न्यायालय ने याचिकाकर्ता से पूछा कि इस याचिका का जनहित से क्या संबंध है और इससे आम नागरिकों को क्या लाभ होगा। लेकिन याचिकाकर्ता इस सवाल का संतोषजनक उत्तर नहीं दे सका। उसके पास ऐसा कोई तथ्य या प्रमाण नहीं था जिससे यह साबित हो सके कि यह मामला जनहित से जुड़ा है या इससे किसी प्रकार की सामाजिक या संवैधानिक हानि हो रही है।

इस आधार पर अदालत ने इस याचिका को खारिज कर दिया और स्पष्ट किया कि अदालत का समय ऐसे मामलों में व्यर्थ नहीं किया जा सकता, जिनका कोई वास्तविक जनहित न हो। कोर्ट ने कहा कि जनहित याचिका एक गंभीर कानूनी माध्यम है, जिसका प्रयोग सोच-समझकर और समाज के व्यापक हित में होना चाहिए। इस निर्णय से यह स्पष्ट संकेत गया है कि अदालतें तर्कहीन और आत्म-प्रचार आधारित याचिकाओं को स्वीकार नहीं करेंगी।

यह फैसला उन लोगों के लिए एक चेतावनी है जो जनहित याचिका को निजी एजेंडे या प्रचार का साधन बनाना चाहते हैं। अदालत ने जनहित की सही परिभाषा को सामने रखते हुए इस प्रकार की अपीलों पर सख्त रुख अपनाया है।

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