ग्वालियर में शुक्रवार को शहर के विकास कार्यों की समीक्षा बैठक आयोजित की गई थी, जिसमें जनप्रतिनिधियों और प्रशासनिक अधिकारियों को बुलाया गया था। इस बैठक में शामिल होने पहुंचे कांग्रेस विधायक डॉ. सतीश सिंह सिकरवार को उस समय असहज स्थिति का सामना करना पड़ा, जब तहसीलदार ने उन्हें वीआईपी गेट पर रोक दिया और मुख्य गेट से प्रवेश देने की अनुमति नहीं दी। तहसीलदार ने उनसे कहा कि वे दूसरे गेट से अंदर जाएं।
इस व्यवहार से नाराज होकर डॉ. सिकरवार ने बैठक में जाने से इनकार कर दिया और गाड़ी में बैठकर घर लौटने लगे। स्थिति तब बदल गई जब केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया की नजर उन पर पड़ी। उन्होंने तुरंत मामले को समझा और खुद जाकर कांग्रेस विधायक से बातचीत की। सिंधिया ने उन्हें शांत किया, स्थिति स्पष्ट की और अपने साथ लेकर बैठक में पहुंचे।
बैठक में पहुंचने के बाद भी विधायक सिकरवार ने अपनी नाराजगी जाहिर की और कहा कि,
> “भाजपा के शासन में भाजपा और कांग्रेस विधायकों के लिए अलग-अलग गेट बनाए गए हैं। यह सही नहीं है। ऐसी व्यवस्था को मैं न तो मानता हूं और न ही चलने दूंगा।”
यह घटना प्रशासनिक व्यवस्था और राजनीतिक शिष्टाचार पर कई सवाल खड़े करती है। एक ओर यह दिखाता है कि सत्ता परिवर्तन के बाद भी जनप्रतिनिधियों के बीच समानता का भाव नहीं रखा जा रहा, वहीं सिंधिया की पहल से यह संदेश गया कि संवाद और परस्पर सम्मान ही राजनीति की सच्ची शक्ति है।
घटना के बाद यह मामला ग्वालियर की राजनीतिक चर्चाओं का विषय बन गया है। विपक्ष ने इसे भेदभावपूर्ण
