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April 16, 2026
The Defence
छत्तीसगढ़

धान खरीदी को लेकर AAP का प्रदेशव्यापी आंदोलन, 29 जनवरी को हर जिले में प्रदर्शन, 28 फरवरी तक तारीख बढ़ाने की मांग

धान खरीदी की समय-सीमा बढ़ाने की मांग को लेकर आम आदमी पार्टी (AAP) ने प्रदेशव्यापी आंदोलन का ऐलान किया है। पार्टी ने स्पष्ट किया है कि 29 जनवरी को राज्य के सभी जिलों में धरना-प्रदर्शन किया जाएगा। AAP की मुख्य मांग है कि धान खरीदी की अंतिम तारीख को बढ़ाकर 28 फरवरी तक किया जाए, ताकि कोई भी किसान अपनी फसल बेचने से वंचित न रह जाए।

पार्टी नेताओं का कहना है कि सरकार की नीतियों और प्रशासनिक अव्यवस्थाओं के कारण बड़ी संख्या में किसान अभी तक धान बेच नहीं पाए हैं। कई केंद्रों पर देर से खरीदी शुरू हुई, जिससे किसानों को भारी परेशानी का सामना करना पड़ा। टोकन वितरण, भौतिक सत्यापन और ऑनलाइन प्रक्रिया की जटिलताओं ने स्थिति को और गंभीर बना दिया है। किसान घंटों लाइन में लगने को मजबूर हैं, फिर भी उन्हें समय पर खरीदी का लाभ नहीं मिल पा रहा है।

प्रदेश संगठन मंत्री तेजेंद्र तोड़ेकर ने आरोप लगाया कि जिन किसानों ने कर्ज लेकर खेती की है, वे धान न बिकने की स्थिति में कर्ज कैसे चुकाएंगे, यह सबसे बड़ा सवाल है। उन्होंने चेतावनी भरे शब्दों में कहा कि अगर ऐसी स्थिति में कोई किसान आत्महत्या जैसा कदम उठाता है, तो इसकी जिम्मेदारी सीधे तौर पर सरकार की होगी। साथ ही सहकारी समितियों में भ्रष्टाचार के आरोप लगाते हुए कहा गया कि लाखों क्विंटल धान में घोटाले की आशंका है, लेकिन अब तक किसी अधिकारी पर एफआईआर दर्ज नहीं हुई है।

प्रदेश अध्यक्ष (कर्मचारी विंग) विजय कुमार झा ने बताया कि कई जिलों में सत्यापन और जब्ती की कार्रवाई से किसानों को मानसिक और आर्थिक रूप से बर्बाद किया जा रहा है। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि कहीं किसानों का रकबा शून्य कर दिया गया, तो कहीं टोकन और पट्टा होने के बावजूद धान जब्त कर लिया गया।

प्रदेश सचिव अनुपा जोसेफ ने सरकार से मांग की कि यदि वास्तव में सरकार किसानों के हित में काम करना चाहती है, तो भौतिक सत्यापन और रकबा समर्पण जैसी प्रक्रियाओं पर रोक लगाई जाए, सभी किसानों को टोकन दिया जाए और धान खरीदी की समय-सीमा 28 फरवरी तक बढ़ाई जाए। उन्होंने कहा कि सरकार का मौजूदा रवैया किसान विरोधी है और इससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर गहरा नकारात्मक असर पड़ रहा है।

AAP ने साफ किया है कि अगर सरकार ने किसानों की मांगों पर ध्यान नहीं दिया, तो यह आंदोलन और अधिक व्यापक रूप ले सकता है, जिसकी जिम्मेदारी पूरी तरह शासन-प्रशासन की होगी।

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