रायपुर। NEET-PG 2025 की काउंसलिंग इस बार छत्तीसगढ़ में बड़े विवाद में उलझ गई है। हाईकोर्ट ने राज्य कोटे में दी जा रही इंस्टिट्यूशनल प्रेफरेंस (संस्थागत प्राथमिकता) को रद्द करते हुए कहा कि यह समानता के अधिकार का उल्लंघन है। कोर्ट के फैसले के बाद डॉक्टरों में नाराज़गी तेज हो गई है और उन्होंने DME से नियमों को तत्काल री-फ्रेम करने की मांग उठाई है।
डॉक्टर्स फेडरेशन का कहना है कि वर्तमान व्यवस्था हजारों MBBS डॉक्टरों पर दोहरी मार डाल रही है। डोमिसाइल नियमों के कारण वे पहले ही अपने मूल राज्य की सीटों से बाहर हैं, और अब छत्तीसगढ़ में भी संस्थागत प्राथमिकता खत्म होने से उनका अधिकार समाप्त हो रहा है।
दिल्ली मॉडल का हवाला — छत्तीसगढ़ में क्यों अवैध?
फेडरेशन का कहना है कि दिल्ली यूनिवर्सिटी (DU) और IPU में PG एडमिशन का पैटर्न सुप्रीम कोर्ट द्वारा मान्य है, जहां—
- 50% सीटें — All India Quota (AIQ), ओपन मेरिट
- 50% सीटें — संस्थागत प्राथमिकता (केवल वहीं से MBBS करने वाले छात्रों के लिए)
डॉक्टरों का सवाल है कि जब दिल्ली में 100% राज्य कोटा के तहत संस्थागत प्राथमिकता वैध मानी गई है, तो वही मॉडल छत्तीसगढ़ में अवैध कैसे हो सकता है?
रीज़नेबल नंबर’ की कोर्ट में बहस
हाईकोर्ट ने डॉ. तन्वी बहल (2025) केस का हवाला देते हुए कहा कि प्राथमिकता केवल “उचित संख्या” में दी जा सकती है। लेकिन विशेषज्ञों का तर्क है कि सुप्रीम कोर्ट पहले ही “Reasonable Number” को कुल सीटों का 50% मान चुका है।
ऐसे में 50% AIQ पहले से ओपन मेरिट को दी जा रही हैं, इसलिए शेष 50% सीटें राज्य कोटे की संस्थागत प्राथमिकता में आ सकती हैं।
DME पर बढ़ा दबाव — नियम री-फ्रेम किए जाएं
काउंसलिंग शेड्यूल नजदीक है और डॉक्टरों का भविष्य अधर में है। फेडरेशन की मांग है कि DME यह स्पष्ट करे कि—
- 50% सीटें AIQ (ओपन मेरिट)
- 50% सीटें संस्थागत प्राथमिकता
के फार्मूले को लागू किया जाए, जिससे हाईकोर्ट की मेरिट संबंधी चिंता भी दूर होगी और सुप्रीम कोर्ट के 50% वाले सिद्धांत का पालन भी हो सकेगा।
