छत्तीसगढ़ में सामने आए कोल लेवी घोटाले ने राज्य की प्रशासनिक और राजनीतिक व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। आर्थिक अपराध अन्वेषण शाखा (EOW) द्वारा दाखिल की गई चार्जशीट के अनुसार, यह पूरा वसूली तंत्र एक संगठित सिंडिकेट के रूप में काम कर रहा था, जिसकी जड़ें मुख्यमंत्री निवास तक बताई जा रही हैं। जांच में दावा किया गया है कि इस सिंडिकेट के जरिए लगभग 253 करोड़ रुपये की अवैध वसूली की गई।
चार्जशीट में पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल की तत्कालीन उपसचिव रहीं सौम्या चौरसिया और रायपुर नगर निगम के रिकॉर्ड कीपर जयचंद कोसले की भूमिका को अहम बताया गया है। EOW का आरोप है कि वसूली से जुड़े निर्देश सीधे सीएम हाउस से दिए जाते थे और सौम्या चौरसिया के कहने पर जयचंद कोसले विभिन्न फाइलों पर मुख्यमंत्री से हस्ताक्षर करवाने का काम करता था। यह पूरा तंत्र सरकारी प्रक्रियाओं का दुरुपयोग कर निजी लाभ के लिए किया जा रहा था।
जांच एजेंसी के अनुसार, जयचंद कोसले को इस वसूली नेटवर्क को सुचारु रूप से चलाने के लिए विशेष सुविधाएं भी दी गईं, जिनमें सरकारी वाहन और प्रशासनिक संरक्षण शामिल था। चार्जशीट में यह भी उल्लेख है कि सिंडिकेट के सदस्य व्हाट्सऐप ग्रुप के जरिए आपस में संपर्क में रहते थे और पैसों के लेन-देन तथा फाइलों की मंजूरी को लेकर योजनाबद्ध तरीके से बातचीत करते थे।
EOW और ACB की रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि मुख्यमंत्री कार्यालय और मुख्यमंत्री निवास से जुड़ी संवेदनशील फाइलों की आवाजाही, उनका सुरक्षित परिवहन और उन पर हस्ताक्षर करवाने जैसे महत्वपूर्ण कार्य नियमित रूप से इसी नेटवर्क के माध्यम से कराए जाते थे। यह मामला न केवल आर्थिक भ्रष्टाचार का है, बल्कि प्रशासनिक पारदर्शिता और जवाबदेही पर भी बड़ा प्रश्नचिह्न लगाता है।
कुल मिलाकर, कोल लेवी घोटाला छत्तीसगढ़ के हालिया इतिहास के सबसे बड़े कथित भ्रष्टाचार मामलों में से एक बनकर उभरा है। अब इस प्रकरण में आगे की कानूनी कार्रवाई और न्यायिक प्रक्रिया पर सभी की निगाहें टिकी हैं, क्योंकि इसका असर राज्य की राजनीति और प्रशासन दोनों पर दूरगामी हो सकता है।
