रायगढ़, 9 जून 2025: छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक राजधानी रायगढ़ में एक युग का अंत हो गया। प्रख्यात तबला वादक और शास्त्रीय संगीत के साधक, चक्रधर सम्मान से सम्मानित कलागुरु वेदमणि सिंह ठाकुर ‘बेदम’ का 97 वर्ष की आयु में सोमवार रात 9:52 बजे निधन हो गया। उनके निधन से छत्तीसगढ़ की कला बिरादरी में शोक की लहर दौड़ गई है। मुख्यमंत्री विष्णु देव साय, पूर्व मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह और कई गणमान्य हस्तियों ने उनके निधन पर गहरा दुख व्यक्त किया है।
संगीत और साधना का एक अनमोल रत्न
वेदमणि सिंह ठाकुर, जिन्हें ‘बेदम’ के नाम से जाना जाता था, ने भारतीय शास्त्रीय संगीत और तबला वादन को अपनी साधना से नई पहचान दी। रायगढ़ के सांस्कृतिक गौरव को विश्व पटल पर ले जाने में उनकी भूमिका अतुलनीय रही। उन्होंने न केवल तबला वादन में महारत हासिल की, बल्कि सैकड़ों शिष्यों को प्रशिक्षित कर छत्तीसगढ़ की कला परंपरा को जीवित रखा। उनके शिष्य आज देश-विदेश में उनकी विरासत को आगे बढ़ा रहे हैं।
वेदमणि जी को उनके अतुलनीय योगदान के लिए छत्तीसगढ़ का सर्वोच्च सांस्कृतिक सम्मान ‘चक्रधर सम्मान’ सहित कई राष्ट्रीय पुरस्कारों से नवाजा गया था। उनकी कला ने रायगढ़ को शास्त्रीय संगीत और नृत्य के क्षेत्र में एक विशेष स्थान दिलाया। उनके निधन को कला जगत की अपूरणीय क्षति माना जा रहा है।
मुख्यमंत्री और नेताओं की श्रद्धांजलि
मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने अपने शोक संदेश में कहा, “कलागुरु वेदमणि सिंह ठाकुर ‘बेदम’ जी का निधन छत्तीसगढ़ के सांस्कृतिक इतिहास के लिए एक बड़ा आघात है। उनकी तबला साधना और कला के प्रति समर्पण हमें हमेशा प्रेरित करता रहेगा। मैं ईश्वर से उनकी आत्मा की शांति और परिजनों को दुख सहने की शक्ति प्रदान करने की प्रार्थना करता हूँ।
”पूर्व मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने X पर लिखा, “बेदम जी ने अपनी कला से रायगढ़ को विश्व में एक नई पहचान दी। उनकी कमी को कभी भरा नहीं जा सकता।” कांग्रेस नेता दीपक बैज ने भी शोक जताते हुए कहा, “वेदमणि सिंह ठाकुर ‘बेदम’ छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक आत्मा थे। उनकी शहादत से हमारी कला परंपरा को गहरा नुकसान हुआ है।
”रायगढ़ की कला परंपरा और बेदम जी का योगदान
वेदमणि सिंह ठाकुर ने रायगढ़ के प्रसिद्ध चक्रधर समारोह को न केवल जीवंत बनाए रखा, बल्कि इसे राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाई। उनके नेतृत्व में रायगढ़ का शास्त्रीय संगीत और नृत्य देश-विदेश में चर्चा का विषय बना। उन्होंने युवा पीढ़ी को शास्त्रीय संगीत की बारीकियां सिखाने के लिए कई कार्यशालाएं और प्रशिक्षण शिविर आयोजित किए। उनकी सिखाई गई तबला वादन की शैली को आज भी ‘रायगढ़ घराना’ के रूप में जाना जाता है।
उनके एक शिष्य पंडित रमेश ठाकुर ने बताया, “बेदम जी केवल एक गुरु नहीं, बल्कि कला के प्रति एक जीवंत प्रेरणा थे। उनकी सादगी और समर्पण हमें हमेशा प्रेरित करता रहेगा।”
