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October 23, 2026
The Defence
छत्तीसगढ़

पुल टूटा, सिस्टम चुप रहा — मितानिन बनी मसीहा, पीठ पर लादकर पहुंचाया अस्पताल

छत्तीसगढ़ के जशपुर जिले के एक सुदूरवर्ती गांव से ऐसी घटना सामने आई है, जो न केवल मितानिनों के साहस को सलाम करती है, बल्कि हमारी ग्रामीण स्वास्थ्य और बुनियादी ढांचे की बदहाली को भी उजागर करती है। मनोरा विकासखंड के सोनक्यारी (सतालूटोली) गांव में एक गर्भवती महिला को जब तेज प्रसव पीड़ा हुई, तब परिजनों ने तत्काल एम्बुलेंस बुलवाई। मगर गांव को मुख्य मार्ग से जोड़ने वाला पुल टूटा होने के कारण एम्बुलेंस वहां तक नहीं पहुंच सकी।

ऐसे समय में गांव की मितानिन (स्वास्थ्य कार्यकर्ता) ने जो किया, वह मिसाल बन गया। उन्होंने न केवल महिला की घर पर सुरक्षित डिलीवरी करवाई, बल्कि नवजात शिशु और मां को अपनी पीठ पर लादकर 1.5 किलोमीटर दूर मुख्य सड़क तक पहुंचाया, जहां से उन्हें सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र ले जाया गया। अस्पताल पहुंचने पर चिकित्सकों ने बताया कि मां और बच्चा दोनों स्वस्थ हैं।

इस घटना ने एक बार फिर यह दिखा दिया कि जब सरकारी तंत्र असफल हो जाता है, तब जमीनी स्तर पर काम करने वाले स्वास्थ्य कार्यकर्ता ही असली नायक बनते हैं। मितानिनें, जिन्हें बेहद कम मानदेय और संसाधनों में काम करना पड़ता है, आज भी कई गांवों में स्वास्थ्य सेवा की रीढ़ बनी हुई हैं।

इस घटना ने प्रशासन और नीति-निर्माताओं से कई सवाल खड़े कर दिए हैं —

क्या आजादी के इतने वर्षों बाद भी पुल और सड़क जैसी बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध नहीं हो सकीं?

क्या यह समय नहीं कि मितानिनों को सिर्फ सम्मान नहीं, बल्कि बेहतर प्रशिक्षण, उपकरण और आर्थिक सहायता भी दी जाए?

जब मितानिन से इस घटना को लेकर पूछा गया, तो उन्होंने बिना कोई श्रेय लिए कहा, “मुझे जो करना था, वो मैंने किया। मैं मितानिन हूं, मेरी जिम्मेदारी है।”

 

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