छत्तीसगढ़ में स्कूली छात्रों के साथ दो अलग-अलग घटनाओं में शिक्षकों द्वारा की गई क्रूरता ने समाज को झकझोर कर रख दिया है। इन मामलों ने न केवल शिक्षा व्यवस्था की गंभीर खामियों को उजागर किया है, बल्कि यह सवाल भी खड़ा कर दिया है कि क्या स्कूल बच्चों के लिए सुरक्षित स्थान बचे हैं?
पहली घटना राजनांदगांव जिले के खालसा पब्लिक स्कूल की है, जहां सातवीं कक्षा के एक छात्र को महिला शिक्षक ने केवल इस बात पर बेरहमी से पीट दिया कि वह समय पर किताब नहीं निकाल पाया। रिपोर्ट्स के मुताबिक, छात्र को चार जोरदार थप्पड़ मारे गए, जिससे उसके कानों में गंभीर चोटें आईं। इस पिटाई के बाद छात्र की सुनने की क्षमता लगभग खत्म हो चुकी है। मेडिकल जांच में पाया गया कि उसके दाएं कान की 70% और बाएं कान की 80% क्षमता खराब हो गई है। अब छात्र को हर चार दिन में रायपुर के एक निजी अस्पताल ले जाना पड़ रहा है। पीड़ित परिवार गहरे सदमे में है और इस घटना को लेकर न्याय की मांग कर रहा है।
वहीं दूसरी घटना रायगढ़ जिले की है, जहां आनंदा मार्ग इंग्लिश मीडियम स्कूल में नर्सरी में पढ़ने वाले तीन साल के एक मासूम बच्चे को शिक्षक ने बुरी तरह पीटा। बच्चे की पीठ पर मारपीट के कई निशान पाए गए हैं। इतनी छोटी उम्र के बच्चे के साथ की गई यह क्रूरता निंदनीय है। परिजनों की शिकायत पर पुलिस ने आरोपी शिक्षक को हिरासत में ले लिया है।
इन घटनाओं ने यह स्पष्ट कर दिया है कि कुछ शिक्षकों में अनुशासन के नाम पर हिंसा की प्रवृत्ति बढ़ रही है, जो बेहद खतरनाक है। शिक्षा संस्थानों में बच्चों के साथ ऐसा व्यवहार अस्वीकार्य है। अब ज़रूरत है कि प्रशासन, शिक्षा विभाग और स्कूल प्रबंधन सख्त कदम उठाएं ताकि भविष्य में ऐसी घटनाएं न हों। साथ ही, शिक्षकों के प्रशिक्षण में भी संवेदनशीलता और सहानुभूति का समावेश अनिवार्य बनाया जाना चाहिए।
