पुलिस विभाग में काम कर रहे अधिकारियों पर अनुशासन, कर्तव्य और ईमानदारी की जिम्मेदारी होती है। लेकिन जब यही अधिकारी भीतर ही भीतर टूटने लगे, तो यह पूरे तंत्र के लिए खतरे की घंटी बन जाता है। मध्य प्रदेश के दतिया जिले में एएसआई प्रमोद पावन की आत्महत्या इसी विफलता की गवाही देती है।
घटना का विवरण:
गोधन थाना परिसर में पदस्थ एएसआई प्रमोद पावन ने अपने सरकारी आवास में फांसी लगाकर जान दे दी। यह कोई सामान्य आत्महत्या नहीं थी। प्रमोद ने आत्महत्या से पहले तीन वीडियो बनाए, जिन्हें सोशल मीडिया पर पोस्ट किया। इन वीडियो में उन्होंने विस्तार से बताया कि किस प्रकार उन्हें लगातार अपमानित किया गया, जातिसूचक शब्दों का इस्तेमाल कर मानसिक रूप से प्रताड़ित किया गया।
वीडियो में दर्द और सच्चाई:
प्रमोद ने वीडियो में टीआई अरविंद भदौरिया, जनफासुल हुसैन, ड्राइवर रूपनारायण यादव और रेत कारोबारी बबलू यादव का नाम लेते हुए कहा कि इन्हीं लोगों ने उसे इस स्थिति तक पहुंचाया। उन्होंने यह भी बताया कि उन्हें 15 दिनों से थाने से बाहर नहीं निकलने दिया गया और बार-बार जातीय अपमान सहना पड़ा।
जातिवाद और प्रताड़ना का मामला:
प्रमोद का दर्द सिर्फ एक व्यक्ति की व्यथा नहीं, बल्कि उस मानसिक यातना का चित्रण है जो कई बार विभागीय राजनीति और भेदभाव के कारण झेलनी पड़ती है। उनका बयान इस बात की गवाही देता है कि जातिवाद और उत्पीड़न की समस्या अब भी हमारे तंत्र में जिंदा है और कई बार यह जानलेवा भी साबित होती है।
