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September 8, 2026
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प्रशांत किशोर की सभा में गूंजा मुद्दा— क्यों छोड़ रहे हैं युवा अपना गांव?

बिहार देश का वह राज्य है, जिसने हमेशा राजनीति, संस्कृति और सामाजिक चेतना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। लेकिन विडंबना यह है कि यहां के युवा आज भी बेहतर शिक्षा और रोजगार की तलाश में अपने गांव-घर छोड़कर महानगरों की ओर पलायन करने को मजबूर हैं। “लागल लागल झूलनियां में धक्का, बलम कलकत्ता चली” जैसी पंक्तियां अब केवल गीत तक सीमित नहीं, बल्कि हर घर की हकीकत बन चुकी हैं।

पलायन की वास्तविकता

बिहार के हर जिले से बड़ी संख्या में युवा पढ़ाई पूरी करने के बाद रोजगार की तलाश में कोलकाता, दिल्ली, मुंबई, पुणे और बेंगलुरु जैसे शहरों में जा रहे हैं। खेत-खलिहान वाले गांव अब खाली होते जा रहे हैं। घरों में बूढ़े माता-पिता और महिलाएं रह जाती हैं, जबकि युवाओं का जीवन दूसरे राज्यों की फैक्ट्रियों, दफ्तरों और निर्माण स्थलों में बीत रहा है। यह न केवल पारिवारिक जीवन को प्रभावित कर रहा है, बल्कि समाज और अर्थव्यवस्था पर भी गहरा असर डाल रहा है।

हसनपुर की सभा और जनमानस की आवाज़

समस्तीपुर जिले के हसनपुर में प्रशांत किशोर की सभा ने इस मुद्दे को और उभार दिया। सभा में स्थानीय लोगों ने स्पष्ट कहा कि अगर बिहार में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और रोजगार की व्यवस्था होती, तो बच्चों को दूसरे राज्यों का रुख नहीं करना पड़ता। सभा का आयोजन तेजप्रताप यादव के विधानसभा क्षेत्र में हुआ, जिससे यह राजनीतिक रूप से भी चर्चा का विषय बना।

प्रशांत किशोर की मौजूदगी और भीड़ का उत्साह यह दिखाता है कि जनता अब केवल जाति और परंपरागत राजनीति से आगे बढ़कर वास्तविक मुद्दों पर चर्चा करना चाहती है। शिक्षा, बेरोजगारी और पलायन जैसे विषय अब सीधे लोगों के जीवन से जुड़े हैं, इसलिए इनकी अनदेखी करना आसान नहीं होगा।

शिक्षा और रोजगार की चुनौतियां

बिहार में शिक्षा की गुणवत्ता लंबे समय से सवालों के घेरे में है। स्कूल-कॉलेजों की हालत बदहाल है और तकनीकी शिक्षा या रोजगारपरक प्रशिक्षण की कमी है। बेरोजगारी दर लगातार बढ़ रही है, जिससे युवा मजबूर होकर बाहर काम ढूंढने जाते हैं। यही वजह है कि बिहार को “देश का श्रमिक आपूर्ति केंद्र” कहा जाने लगा है।

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