छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में राज्य महिला आयोग के भीतर इन दिनों भारी विवाद चल रहा है। आयोग की तीन सदस्य — लक्ष्मी वर्मा, सरला कोसरिया और दीपिका सोरी — ने आयोग की अध्यक्ष डॉ. किरणमयी नायक और सचिव अभय सोनवानी पर गंभीर आरोप लगाए हैं। सदस्यों का कहना है कि आयोग की कार्यप्रणाली पूरी तरह से “मनमानी” बन गई है और नियमों की खुलेआम अनदेखी की जा रही है।
सदस्यों का आरोप है कि आयोग की सुनवाईयों में पारदर्शिता नहीं है और फैसले अकेले अध्यक्ष द्वारा लिए जा रहे हैं। उन्होंने कहा कि आयोग की बैठक और सुनवाई में अन्य सदस्यों को शामिल नहीं किया जाता, जिससे निष्पक्षता पर सवाल खड़े हो रहे हैं।
इसके साथ ही यह भी आरोप लगाया गया है कि सुनवाई के दौरान अनधिकृत लोगों को उपस्थित रहने दिया जाता है, यहां तक कि अध्यक्ष के पति की भी आयोग परिसर में लगातार मौजूदगी देखी जाती है। यह स्थिति आयोग के अधिकार क्षेत्र और गोपनीयता नियमों का उल्लंघन बताई जा रही है।
सदस्यों ने बताया कि सचिव पर भी पक्षपात के आरोप हैं। कुछ मामलों में एक पक्ष से अनुचित प्रभाव या लाभ लेने की शिकायतें सामने आई हैं। यह भी कहा गया कि कई बार सुनवाई का कोरम पूरा न होने के बावजूद निर्णय सुना दिया जाता है, जो आयोग के नियमों के विपरीत है।
आयोग की इन अनियमितताओं से नाराज़ सदस्यों ने सार्वजनिक सुनवाई का बहिष्कार कर दिया है और अपनी शिकायत राज्य सरकार, विधि विभाग और राज्यपाल तक पहुंचाने का निर्णय लिया है। उनका कहना है कि यदि स्थिति नहीं सुधरी तो वे न्यायालय का रुख करने को भी तैयार हैं।
वहीं, इस पूरे विवाद पर अध्यक्ष डॉ. किरणमयी नायक ने फिलहाल कोई टिप्पणी करने से इनकार कर दिया है। उन्होंने कहा कि इस मुद्दे पर सचिव ही जानकारी देंगे।
यह विवाद इसलिए भी संवेदनशील है क्योंकि महिला आयोग एक ऐसी संस्था है जो महिलाओं के अधिकारों की रक्षा और न्याय दिलाने के लिए बनी है। अगर आयोग के भीतर ही पारदर्शिता और निष्पक्षता पर सवाल उठ रहे हैं, तो यह संस्था की विश्वसनीयता पर गंभीर असर डाल सकता है।
अब देखना होगा कि इस मामले पर सरकार और संबंधित विभाग क्या रुख अपनाते हैं और क्या इस विवाद का समाधान निष्पक्ष जांच के ज़रिए हो पाएगा या नहीं।
