बिहार की राजनीति में 2025 का विधानसभा चुनाव सिर्फ एक चुनाव नहीं, बल्कि रणनीतिक मुकाबला बन चुका है। इस मुकाबले में अमित शाह ने जिस तरह चालें चली हैं, उसने पूरे चुनावी परिदृश्य को हिला दिया है। बीजेपी अब सिर्फ सत्ता हासिल करने के लिए नहीं लड़ रही, बल्कि राज्य की राजनीति में अपनी निर्णायक भूमिका तय करने की दिशा में आगे बढ़ रही है।
सबसे पहले बीजेपी ने गठबंधन की राजनीति में बड़ा कदम उठाते हुए नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री पद पर बनाए रखा। यह फैसला तत्कालिक तौर पर ‘कुर्बानी’ जैसा लगा, लेकिन इससे पार्टी ने स्थिरता और भरोसे का संदेश दिया। इसने उस तबके को भी अपने करीब लाया जो नीतीश के नेतृत्व पर भरोसा करता है।
दूसरा बड़ा कदम था सामाजिक समीकरणों को साधना। सम्राट चौधरी को प्रदेश अध्यक्ष बनाकर बीजेपी ने पिछड़े वर्ग में अपनी पकड़ और मजबूत की है। वहीं चिराग पासवान और जीतन राम मांझी जैसे नेताओं को सम्मानजनक सीटें देकर दलित और महादलित वर्गों को भी साधा गया।
इस बीच उपेंद्र कुशवाहा को फिर से साथ लाना बीजेपी की रणनीति में ‘वोट बैंक विस्तार’ का संकेत है। इससे पार्टी ने यह दिखाया कि वह पुराने मतभेदों को भुलाकर एकजुटता का माहौल बना सकती है। सीट बंटवारे में जेडीयू के बराबर हिस्सेदारी हासिल करना बीजेपी को ‘छोटे भाई’ की छवि से बाहर निकालकर एक ‘समान भागीदार’ के रूप में स्थापित करता है।
सबसे बड़ा मास्टरस्ट्रोक रहा उम्मीदवारों की घोषणा। जब विपक्षी खेमे में सीटों पर खींचतान चल रही है, बीजेपी ने 71 उम्मीदवारों की घोषणा कर चुनावी दौड़ में मनोवैज्ञानिक बढ़त हासिल कर ली है। इससे कार्यकर्ताओं में उत्साह बढ़ा और विपक्ष पर दबाव भी बना।
