July 23, 2026
The Defence
बड़ी खबर

मध्य प्रदेश सरकार ने कहा—अब केंद्र ही करे गेहूं-धान की खरीदी; राज्य पर 77 हजार करोड़ का कर्ज़”

मध्य प्रदेश सरकार ने इस बार गेहूं और धान की सरकारी खरीदी से अपने हाथ पीछे खींच लिए हैं। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने केंद्र सरकार को पत्र लिखते हुए कहा है कि अब प्रदेश इन फसलों की खरीदी नहीं करेगा और केंद्र सरकार को यह जिम्मेदारी उठानी चाहिए। सरकार का कहना है कि नागरिक आपूर्ति निगम (नान) पर 77,000 करोड़ रुपये का भारी-भरकम कर्ज़ हो चुका है, जिससे आगे खरीदी करना आर्थिक रूप से संभव नहीं है।

राज्य में गेहूं की विकेंद्रीकृत खरीदी व्यवस्था वर्ष 1999 में और धान की खरीदी 2007 में शुरू की गई थी। इस प्रणाली के तहत राज्य सरकार किसानों से अनाज खरीदती है और बाद में भारतीय खाद्य निगम (FCI) को सौंप देती है। लेकिन इस पूरी प्रक्रिया में भंडारण, परिवहन, ब्याज और रखरखाव जैसे सभी खर्च राज्य सरकार को उठाने पड़ते हैं। यही कारण है कि सरकार को अब इस व्यवस्था से आर्थिक नुकसान उठाना पड़ रहा है।

सरकार ने अपने फैसले के पीछे तीन मुख्य कारण बताए हैं—

पहला कारण: खरीदी ज्यादा, खपत कम।

इस साल प्रदेश में 78 लाख मीट्रिक टन गेहूं खरीदा गया, जबकि राज्य में केवल 20 लाख मीट्रिक टन ही राशन वितरण के लिए उपयोग हुआ। बाकी लगभग 58 लाख मीट्रिक टन अतिरिक्त अनाज बाद में एफसीआई को सौंपना पड़ा। इस पूरी प्रक्रिया में ट्रांसपोर्ट, भंडारण और रखरखाव का बड़ा खर्च राज्य सरकार को झेलना पड़ा।

दूसरा कारण: भुगतान में देरी और अधूरी प्रतिपूर्ति।

राज्य सरकार को केंद्र से खरीदी की लागत की वापसी बहुत देर से मिलती है। कई बार यह प्रक्रिया 2 से 3 साल तक चलती है और तब भी केवल 90 से 95 प्रतिशत राशि ही वापस आती है। कई खर्चों पर केंद्र और राज्य के बीच सहमति नहीं बन पाती, जिससे भुगतान अटक जाता है।

तीसरा कारण: कर्ज़ का बढ़ता बोझ।

इस साल गेहूं खरीदी के लिए राज्य सरकार ने 20,000 करोड़ रुपये का कर्ज लिया, जबकि पिछले साल धान खरीदी पर 10,000 करोड़ रुपये का कर्ज लिया गया था। इस साल भी धान पर उतना ही खर्च होने की उम्मीद है। यानी केवल एक फसल चक्र में लगभग ₹30,000 करोड़ रुपये का नया कर्ज़ बन रहा है, जिसकी वसूली कई सालों बाद ही संभव होती है।

मुख्यमंत्री ने अपने पत्र में यह भी उल्लेख किया है कि प्रदेश में गेहूं का उपार्जन 77.74 लाख मीट्रिक टन और धान का 43.49 लाख मीट्रिक टन तक पहुंच गया है। लेकिन स्टॉक की निकासी में देरी और भुगतान में रुकावट के कारण राज्य को आर्थिक नुकसान उठाना पड़ रहा है।

राज्य सरकार ने केंद्र से आग्रह किया है कि आने वाले सत्र से गेहूं और धान की खरीदी केंद्रीयकृत प्रणाली से की जाए, ताकि प्रदेश को राहत मिल सके। यदि केंद्र इस प्रस्ताव को स्वीकार करता है, तो किसानों से सीधे अनाज की खरीदी एफसीआई द्वारा की जाएगी।

हालांकि सरकार का दावा है कि इस बदलाव से किसानों या आम जनता पर कोई नकारात्मक असर नहीं पड़ेगा, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि एफसीआई के सख्त गुणवत्ता मानकों के कारण बड़ी संख्या में किसानों की उपज रिजेक्ट हो सकती है। इससे किसानों को अपनी मेहनत की कीमत पाने में कठिनाई हो सकती है।

Related posts

उत्तराखंड के थराली में बादल फटने से तबाही: एक की मौत, 80 घरों में भरा मलबा, सेना ने संभाला रेस्क्यू

admin

Bihar Chunav 2025: NDA की भारी जीत के बाद सत्ता परिवर्तन तेज

admin

दिल्ली ब्लास्ट लिंक: तीसरी संदिग्ध कार हरियाणा के अल-फलाह यूनिवर्सिटी से बरामद

admin

Leave a Comment