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June 5, 2026
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किसान आंदोलन 2.0 में नेतृत्व संकट: जगजीत सिंह डल्लेवाल पर बगावत, संगठन दो धड़ों में बंटा

किसान आंदोलन 2.0 को नेतृत्व देने वाले प्रमुख चेहरे जगजीत सिंह डल्लेवाल को उस समय बड़ा राजनीतिक और संगठनात्मक झटका लगा, जब भारतीय किसान यूनियन (एकता–सिद्धूपुर) में उनके खिलाफ खुला विरोध सामने आ गया। पटियाला के पास बहादुरगढ़ में हुई एक अहम बैठक के बाद संगठन के भीतर गहरी दरार स्पष्ट हो गई और आंदोलन से जुड़ा मोर्चा दो हिस्सों में बंटता नजर आया।

डल्लेवाल पर आरोप है कि उन्होंने संगठन को व्यक्तिगत ढंग से संचालित किया और पिछले छह वर्षों से संगठनात्मक चुनाव नहीं कराए, जबकि नियमों के अनुसार हर तीन वर्ष में चुनाव अनिवार्य हैं। नाराज पदाधिकारियों का कहना है कि निर्णय प्रक्रिया में पारदर्शिता की कमी रही और असहमति जताने वाले सदस्यों को संगठन से बाहर का रास्ता दिखाया गया।

किसान आंदोलन 2.0 के दौरान न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) की कानूनी गारंटी जैसी मांगों को लेकर डल्लेवाल ने 26 नवंबर से 9 अप्रैल तक 131 दिनों का लंबा अनशन किया था। इसके साथ ही शंभू और खनौरी बॉर्डर पर चले आंदोलन की कमान भी उन्हीं के हाथों में रही। हालांकि अब संगठन के एक धड़े का कहना है कि संयुक्त किसान मोर्चा (SKM) से अलग होकर सीमाओं पर आंदोलन चलाने का फैसला रणनीतिक रूप से गलत साबित हुआ, जिससे आंदोलन को अपेक्षित मजबूती नहीं मिल सकी।

नाराज गुट के प्रमुख नेता दलवीर सिंह सिद्धूपुर ने आरोप लगाया कि लंबे चले आंदोलन के दौरान कुछ किसानों की जान गई, कई किसानों के ट्रैक्टर और सामान चोरी हुए, जिनका आज तक कोई स्पष्ट हिसाब नहीं मिल पाया। उनका यह भी कहना है कि जिन सदस्यों ने डल्लेवाल के फैसलों पर सवाल उठाए, उन्हें संगठन से निष्कासित कर दिया गया।

इस विरोध के बाद संगठन के नाराज धड़े ने पिशोरा सिंह सिद्धूपुर के बेटे दलवीर सिंह सिद्धूपुर को नया संयोजक घोषित कर दिया। वहीं, डल्लेवाल समर्थक गुट ने इन आरोपों को सिरे से खारिज किया है। उनके करीबी नेता काका सिंह कोटरा ने संगठन में किसी भी तरह की टूट से इनकार किया और कहा कि डल्लेवाल गुट जल्द ही जालंधर में प्रेस कॉन्फ्रेंस कर सभी आरोपों का जवाब देगा।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह घटनाक्रम न केवल किसान आंदोलन 2.0 की दिशा को प्रभावित कर सकता है, बल्कि पंजाब की किसान राजनीति में भी नए समीकरण बना सकता है। संगठन के भीतर जारी यह संघर्ष आने वाले दिनों में आंदोलन की रणनीति और उसकी एकजुटता पर गहरा असर डालने वाला माना जा रहा है।

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