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April 19, 2026
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छत्तीसगढ़

राष्ट्रीय परिसंवाद में टकराव: बिलासपुर GGU में साहित्यिक मंच पर विवाद, कुलपति के रवैये से भड़के लेखक, कार्यक्रम हुआ प्रभावित

बिलासपुर। छत्तीसगढ़ के गुरु घासीदास केंद्रीय विश्वविद्यालय (GGU) में आयोजित राष्ट्रीय साहित्यिक परिसंवाद उस समय विवादों में घिर गया, जब मंच पर हुई नोकझोंक के बाद एक साहित्यकार को सभा से बाहर जाने के लिए कहा गया। घटना के बाद कार्यक्रम का माहौल गर्म हो गया और कई अतिथि व साहित्यकार असहज होकर बीच में ही कार्यक्रम छोड़कर निकल गए।

जानकारी के अनुसार, विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग और साहित्य अकादमी के संयुक्त तत्वावधान में “समकालीन हिंदी कहानी: बदलते जीवन संदर्भ” विषय पर राष्ट्रीय परिसंवाद आयोजित किया गया था। इसमें मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, ओडिशा सहित कई राज्यों से साहित्यकार और प्राध्यापक आमंत्रित किए गए थे। कार्यक्रम के दौरान कुलपति प्रो. आलोक चक्रवाल मंच से अपने जीवन अनुभव और व्यक्तिगत कथाओं का उल्लेख करने लगे, जिससे कुछ साहित्यकारों को लगा कि चर्चा विषय से भटक रही है।

इसी दौरान महाराष्ट्र से आए साहित्यकार मनोज रूपण ने यह टिप्पणी की कि यदि चर्चा विषय पर केंद्रित रहे तो बेहतर होगा। इस बात पर कुलपति नाराज हो गए और खुले मंच से कड़ी प्रतिक्रिया देते हुए साहित्यकार से बात करने का “तमीज” सीखने की नसीहत दी। इसके बाद उन्होंने आयोजकों को निर्देश देते हुए संबंधित साहित्यकार को कार्यक्रम से बाहर जाने को कह दिया।

इस घटनाक्रम से सभागार का वातावरण तनावपूर्ण हो गया। कई साहित्यकारों और प्राध्यापकों ने इसे अकादमिक गरिमा के खिलाफ बताते हुए विरोध दर्ज कराया। कुछ अतिथियों ने कार्यक्रम का बहिष्कार किया, जबकि अन्य सत्रों पर भी इसका असर पड़ा। सोशल मीडिया पर इस घटना का वीडियो वायरल होने के बाद मामला और तूल पकड़ता नजर आया।

कार्यक्रम में मौजूद कई प्रतिभागियों का कहना था कि मतभेदों को संवाद और शालीन तरीके से सुलझाया जा सकता था। उनके अनुसार, प्रतिष्ठित शैक्षणिक मंच पर इस तरह का टकराव विश्वविद्यालय की छवि और अकादमिक संस्कृति के अनुरूप नहीं है।

घटना को लेकर विश्वविद्यालय परिसर में दिनभर चर्चा चलती रही। आयोजकों और कुलपति पक्ष से प्रतिक्रिया लेने का प्रयास किया गया, लेकिन संपर्क नहीं हो सका। वहीं, साहित्यिक जगत के कई लोगों ने इस पूरे घटनाक्रम को दुर्भाग्यपूर्ण बताते हुए कहा कि साहित्यिक परिसंवाद संवाद और विचार-विमर्श के मंच होते हैं, न कि टकराव के।

इस विवाद के बाद राष्ट्रीय परिसंवाद का मूल उद्देश्य पीछे छूट गया और साहित्यिक विमर्श की जगह प्रशासनिक और व्यवहारिक मुद्दों पर चर्चा हावी हो गई। मामला अब अकादमिक हलकों में गंभीर बहस का विषय बन गया है।

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