July 24, 2026
The Defence
छत्तीसगढ़

“संसार से संन्यास तक: आस्था, त्याग और तपस्या के मार्ग पर आठ परिवारों की ऐतिहासिक यात्रा”

छत्तीसगढ़ के रायपुर शहर से सामने आई यह घटना केवल एक धार्मिक निर्णय नहीं, बल्कि आस्था, त्याग और आत्मिक जागरण की गहरी मिसाल बनकर उभरी है। एक ही परिवार के कई सदस्यों द्वारा एक साथ सांसारिक जीवन त्यागकर मुमुक्ष बनने का निर्णय समाज के लिए आश्चर्य और प्रेरणा दोनों का विषय बन गया है।

परिवार के मुखिया आशीष सुराना बचपन से ही धार्मिक प्रवृत्ति के रहे हैं। उन्होंने जीवन को केवल भौतिक सुख-सुविधाओं तक सीमित न मानकर आत्मिक शांति और मोक्ष के मार्ग को अपनाने की इच्छा व्यक्त की। उनकी इस सोच में पत्नी ऋतु सुराना और दोनों बच्चे आर्यन (16) और आरुष (14) भी पूरी तरह सहभागी बने। पूरे परिवार ने गुरु के मार्गदर्शन में कठिन तप, संयम और आत्मसंयम की परीक्षा दी।

धार्मिक दीक्षा से पहले गुरु द्वारा परिवार की कठोर परीक्षा ली गई। बच्चों को कई दिनों तक सीमित भोजन दिया गया, सांसारिक सुविधाओं से दूर रखा गया और आत्मसंयम का अभ्यास कराया गया। सबसे कठिन परीक्षा 18 घंटे तक नंगे पांव चलने की रही, जिसे पूरे परिवार ने सफलतापूर्वक पूर्ण किया। इस कठिन साधना के बाद परिवार को मुमुक्ष बनने की अनुमति प्राप्त हुई।

आशीष सुराना ने मोक्ष मार्ग अपनाने से पहले अपना व्यवसाय भी त्याग दिया। रायपुर में चल रहे उनके होलसेल बैग बिजनेस को बेचकर उन्होंने यह स्पष्ट कर दिया कि उनका निर्णय केवल भावनात्मक नहीं, बल्कि पूर्णतः संकल्प आधारित है। परिवार के साथ समय बिताने के बाद वे पत्नी और बच्चों सहित मुमुक्ष जीवन की राह पर निकल पड़े।

इसी क्रम में रायपुर के ही एक अन्य परिवार से 13 वर्षीय तनिष सोनिगरा का उदाहरण भी सामने आया है, जिसने कम उम्र में ही मुमुक्ष बनने का संकल्प लिया। आधुनिक जीवनशैली, फिल्में, भोजन और सामान्य बाल-सुखों से जुड़ा रहने वाला तनिष स्वयं दीक्षा लेने की इच्छा लेकर आगे आया। माता-पिता के लिए यह निर्णय भावनात्मक रूप से कठिन था, लेकिन बच्चे की दृढ़ इच्छा देखकर उन्होंने उसका साथ दिया।

इसके अलावा 27 वर्षीय सुरभि भंसाली जैसी युवा भी सांसारिक सुखों, आधुनिक जीवनशैली, सोशल मीडिया और करियर के रास्ते को छोड़कर साध्वी बनने की ओर अग्रसर हुईं। उच्च शिक्षा, तकनीकी पढ़ाई और आधुनिक सोच के बावजूद उन्होंने आत्मिक शांति को जीवन का लक्ष्य बनाया।

इन सभी घटनाओं ने यह स्पष्ट कर दिया है कि मुमुक्ष बनना केवल धार्मिक परंपरा नहीं, बल्कि गहन आत्मिक यात्रा है। यह मार्ग त्याग, तप, अनुशासन, संयम और आत्मबोध से होकर गुजरता है। समाज के लिए यह घटनाएँ यह संदेश देती हैं कि सच्चा सुख केवल भौतिक संसाधनों में नहीं, बल्कि आत्मिक शांति और संतुलन में निहित है।

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