चीन ने एक नया अंतरराष्ट्रीय संगठन खड़ा किया है, जो देशों के बीच विवादों को सुलझाने का मंच बनेगा। इसे सीधे तौर पर इंटरनेशनल कोर्ट ऑफ जस्टिस (ICJ) के विकल्प के तौर पर देखा जा रहा है। खास बात ये है कि इस संगठन में अमेरिका और यूरोप नहीं, बल्कि पाकिस्तान, क्यूबा, रूस, ईरान जैसे 33 देश शामिल हुए हैं।
इस कदम को चीन की “पश्चिमी दबदबे को तोड़ने” की नई रणनीति माना जा रहा है।
क्या है चीन का नया ‘विवाद समाधान संगठन’?
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इसे कोई कोर्ट नहीं, बल्कि एक “न्यायिक मंच” कहा जा रहा है जो देशों के बीच व्यापार, सीमा और निवेश जैसे मुद्दों पर फैसला देगा।
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चीन का दावा है कि यह “राजनीति से दूर, निष्पक्ष और समावेशी” प्रक्रिया होगी, जहां विकासशील देशों की भी आवाज़ सुनी जाएगी।
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इसकी औपचारिक शुरुआत बीजिंग में हुई, जिसमें 33 देशों ने सदस्यता ली।
पाकिस्तान और क्यूबा समेत शामिल 33 देश कौन हैं?
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एशिया: पाकिस्तान, ईरान, म्यांमार, कंबोडिया
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अफ्रीका: इथियोपिया, सूडान, अंगोला
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लैटिन अमेरिका: क्यूबा, वेनेजुएला, निकारागुआ
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यूरोपीय ब्लॉक: रूस, बेलारूस, कजाखस्तान
(अधिकांश देश अमेरिका विरोधी माने जाते हैं)
चीन क्या चाहता है?
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चीन का मानना है कि अंतरराष्ट्रीय विवाद निपटारे के मौजूदा मंचों (जैसे ICJ, WTO) में पश्चिमी देशों का ज्यादा प्रभाव है, और विकासशील देशों की आवाज़ दब जाती है।
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यह नया संगठन बीजिंग की उस रणनीति का हिस्सा है, जिसके जरिए वह दुनिया में एक वैकल्पिक व्यवस्था खड़ी करना चाहता है — जैसे पहले उसने “BRI” (Belt and Road Initiative) शुरू किया था।
क्या ये ‘न्याय’ होगा या ‘राजनीति’?
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कई विशेषज्ञों ने सवाल उठाए हैं कि इस संगठन में कई ऐसे देश हैं जो खुद मानवाधिकार और लोकतंत्र को लेकर सवालों के घेरे में हैं।
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साथ ही, संयुक्त राष्ट्र के तहत मान्यता प्राप्त न होने के कारण इसके फैसलों की कानूनी वैधता भी सीमित हो सकती है।
भारत का क्या स्टैंड है?
इस संगठन में भारत शामिल नहीं है। भारत पहले ही चीन के “Belt and Road” प्रोजेक्ट और ग्लोबल गवर्नेंस मॉडल पर सवाल उठा चुका है। भारत की ओर से अभी इस पर कोई आधिकारिक बयान नहीं आया है, लेकिन कूटनीतिक हलकों में इसे “चीन की सॉफ्ट पावर चाल” माना जा रहा है।
