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October 22, 2026
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कैश कांड में जस्टिस वर्मा पर गहराया संकट: जांच पैनल की सिफारिश- जज को हटाओ, स्टोर रूम था उनके कब्जे में

नई दिल्ली। दिल्ली हाई कोर्ट के जज जस्टिस यशवंत वर्मा के खिलाफ कैश कांड में सुप्रीम कोर्ट की जांच कमेटी ने चौंकाने वाला खुलासा किया है। 64 पेज की अपनी विस्तृत रिपोर्ट में कमेटी ने जस्टिस वर्मा को पद से हटाने की सिफारिश की है। रिपोर्ट में साफ तौर पर कहा गया है कि जज के दिल्ली स्थित आवास के स्टोर रूम, जहां से करीब 10 करोड़ रुपये की जली हुई नोटों की गड्डियां बरामद हुई थीं, पर जस्टिस वर्मा और उनके परिवार का ही एकमात्र नियंत्रण था। इस मामले ने न्यायपालिका की साख को गंभीर ठेस पहुंचाई है, और प्रयागराज हाई कोर्ट बार एसोसिएशन ने जज के खिलाफ महाभियोग की मांग तेज कर दी है।

क्या है मामला?

यह सनसनीखेज मामला मार्च 2025 में तब सामने आया, जब जस्टिस वर्मा के दिल्ली स्थित आवास पर आग लगने की घटना हुई। आग बुझाने के दौरान पुलिस को स्टोर रूम से जली हुई नोटों की गड्डियां मिलीं, जिनकी कीमत करोड़ों में आंकी गई। इस घटना ने पूरे देश में हड़कंप मचा दिया। सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश (CJI) जस्टिस संजीव खन्ना ने मामले की गंभीरता को देखते हुए तीन सदस्यीय जांच कमेटी का गठन किया। कमेटी ने अपनी जांच में पाया कि स्टोर रूम तक पहुंच केवल जस्टिस वर्मा और उनके परिवार के पास थी। साथ ही, जज इस कैश के स्रोत को साबित करने में नाकाम रहे, जिसने उनके खिलाफ शक को और गहरा कर दिया।

जांच कमेटी के निष्कर्ष

64 पेज की इस गोपनीय रिपोर्ट में कमेटी ने कई अहम बिंदुओं को रेखांकित किया:

  • स्टोर रूम से बरामद जली हुई नोटों का कोई वैध स्रोत नहीं बताया जा सका।
  • स्टोर रूम पर जस्टिस वर्मा और उनके परिवार का विशेष नियंत्रण था, जिससे उनकी जिम्मेदारी तय होती है।
  • इस मामले ने जनता में न्यायपालिका के प्रति भरोसे को कमजोर किया है, इसलिए जज को पद से हटाना जरूरी है।

रिपोर्ट को CJI ने राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री कार्यालय को सौंप दिया है। अब इस पर संसद में चर्चा और संभावित महाभियोग की प्रक्रिया शुरू होने की संभावना है।

जस्टिस वर्मा का जवाब
जस्टिस वर्मा ने इन आरोपों को पूरी तरह खारिज करते हुए इसे उनके खिलाफ साजिश बताया है। उनका दावा है कि यह कैश उनका नहीं था और कुछ लोग उनकी छवि को धूमिल करने की कोशिश कर रहे हैं। हालांकि, जांच कमेटी ने उनके दावों को ठोस सबूतों के अभाव में स्वीकार नहीं किया।

सुप्रीम कोर्ट और आरटीआई विवाद

सुप्रीम कोर्ट ने इस जांच रिपोर्ट को आरटीआई के तहत सार्वजनिक करने से इनकार कर दिया है, जिससे विवाद और बढ़ गया है। कोर्ट का कहना है कि यह तीसरे पक्ष की जानकारी है, जिसे गोपनीय रखा जाना चाहिए। इस फैसले की विपक्षी नेताओं और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने कड़ी आलोचना की है। उनका कहना है कि यह न्यायपालिका की पारदर्शिता पर सवाल उठाता है।

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