अंतरराष्ट्रीय योग दिवस पर राजधानी रायपुर ने ऐसी मिसाल पेश की, जिसने न केवल शरीर को बल्कि दिलों को भी जोड़ा। इस आयोजन की सबसे खास झलक तब देखने को मिली, जब एक दिव्यांग लड़की ने बैसाखी के सहारे योगासन कर सबको प्रेरित कर दिया। वह मुस्कुराते हुए अपने हाथों और संतुलन के सहारे योग करती रही और यह संदेश देती रही कि कोई भी शारीरिक बाधा आत्मबल के आगे छोटी पड़ जाती है।
इस आयोजन को और भी खास बना दिया रायपुर के मुस्लिम और ईसाई समाज की महिलाओं की सक्रिय भागीदारी ने। वे भी पूरे उत्साह के साथ योग सत्रों में शामिल हुईं। हिजाब और क्रॉस पहनकर आई महिलाओं ने एक सुर में कहा, “योग सेहत का जरिया है, धर्म से इसका कोई विरोध नहीं है। हम फिट रहना चाहते हैं, समाज को जोड़ना चाहते हैं।”
शहर के विभिन्न मैदानों और शिक्षण संस्थानों में सुबह-सुबह हजारों लोगों ने सूर्य नमस्कार, प्राणायाम और अन्य योगासन किए। सरकारी विभागों, सामाजिक संगठनों, और विद्यालयों ने भी बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। कार्यक्रमों में विशेषज्ञों ने योग के स्वास्थ्य लाभों को लेकर भी जागरूकता फैलाई।
इस दिन ने यह स्पष्ट कर दिया कि योग आज सिर्फ एक एक्सरसाइज नहीं, बल्कि एक साझा संस्कृति, एक भावना और एकता का माध्यम बन चुका है। जब धर्म, वर्ग, लिंग या शारीरिक स्थिति की सीमाएं टूटती हैं और सभी मिलकर एक साथ शांति और स्वास्थ्य की ओर बढ़ते हैं – वहीं असली योग होता है।
