September 4, 2026
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“जस्टिस प्रशांत कुमार पर सुप्रीम राहत, क्रिमिनल केस से हटाने का आदेश”

भारत की न्यायपालिका में हाल ही में एक महत्वपूर्ण और चर्चित फैसला सामने आया है। सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस प्रशांत कुमार से संबंधित आपराधिक मामलों को लेकर एक विशेष आदेश जारी किया है। कोर्ट ने स्पष्ट रूप से कहा है कि जब तक जस्टिस प्रशांत कुमार सेवा में हैं यानी रिटायर नहीं होते, तब तक उन्हें कोई भी आपराधिक केस न सौंपा जाए।

इस आदेश के पीछे सुप्रीम कोर्ट की मंशा न्यायिक निष्पक्षता और व्यवस्था की मर्यादा को बनाए रखने की है। कोर्ट का मानना है कि यदि किसी न्यायाधीश के ऊपर आपराधिक मामलों की जिम्मेदारी बनी रहेगी, तो इससे न्यायिक प्रक्रिया की गरिमा पर प्रश्न उठ सकते हैं। इसलिए यह फैसला एक तरह की “एहतियाती व्यवस्था” के रूप में देखा जा रहा है।

हालांकि, सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश के बाद न्यायपालिका के भीतर मतभेद और हलचल देखी गई है। इलाहाबाद हाईकोर्ट के कुल 13 वरिष्ठ जजों ने इस आदेश को लेकर असहमति जाहिर करते हुए फुल कोर्ट मीटिंग बुलाने की मांग की है। यह मांग सीधे तौर पर सुप्रीम कोर्ट के आदेश के खिलाफ मानी जा रही है, जिससे न्यायपालिका के भीतर संवैधानिक और नैतिक प्रश्न उठने लगे हैं।

इस पूरे घटनाक्रम ने देशभर में यह बहस छेड़ दी है कि क्या सुप्रीम कोर्ट द्वारा जारी इस तरह के व्यक्तिगत निर्देश संविधान की आत्मा के अनुकूल हैं या नहीं। साथ ही, यह भी पूछा जा रहा है कि क्या किसी न्यायाधीश को आपराधिक मामलों से पूरी तरह दूर कर देना न्यायिक संतुलन को प्रभावित कर सकता है?

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