28 साल के शुभांशु वर्मा ने इतिहास रच दिया है। वो पहले युवा भारतीय वैज्ञानिक बन गए हैं, जिन्होंने नासा-इसरो मिशन के तहत इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन (ISS) में एंट्री की है। आज दोपहर 3:48 बजे उनका स्पेसक्राफ्ट सफलतापूर्वक ISS से जुड़ा। डॉकिंग के कुछ मिनट बाद ही उन्होंने स्पेस से अपना पहला संदेश भेजा—
“नमस्कार फ्रॉम स्पेस… यहां सबकुछ हवा में है, मैं फिर से जीना सीख रहा हूं।”
उनकी आवाज में झलक रहा था गर्व भी और जिज्ञासा भी:
शुभांशु ने बताया, “यहां न गुरुत्वाकर्षण है, न ज़मीन… चीज़ें हवा में तैर रही हैं। चलने के लिए हाथों से दीवार पकड़नी पड़ती है, खाने के लिए पैकेट को मुंह से चूसना पड़ता है, और सोने के लिए खुद को बैल्ट से बांधना पड़ता है।”
गोरखपुर के शुभांशु की यह कहानी सिर्फ स्पेस की नहीं, संघर्ष की भी है:
- मध्यमवर्गीय परिवार से आने वाले शुभांशु बचपन से ही स्पेस साइंस के दीवाने थे
- IIT से पढ़ाई के बाद उन्हें अमेरिका की एक यूनिवर्सिटी में रिसर्च फेलोशिप मिली
- वहां से उनकी प्रतिभा को नासा ने पहचाना और इस मिशन के लिए सेलेक्ट किया
अब अंतरिक्ष में क्या करेंगे शुभांशु?
- शरीर पर माइक्रोग्रैविटी का असर: कोशिकाओं, मांसपेशियों और हड्डियों का अध्ययन
- स्पेस डाइट की रिसर्च: जीरो ग्रैविटी में खाने के पोषक तत्वों पर स्टडी
- बायोमेडिकल रिसर्च: कैसे स्पेस में मिले डेटा से धरती के मरीजों को नई दवाएं मिल सकती हैं

साथ में चल रहा है 4 देशों का क्रू:
अमेरिका, जापान, जर्मनी और भारत के वैज्ञानिक इस मिशन में साथ हैं शुभांशु का काम सबसे महत्वपूर्ण रिसर्च मॉड्यूल में है। मिशन का नाम: ‘Project Helios-25’
मां ने कहा- आज मेरा बेटा चांद नहीं, अंतरिक्ष में है
गोरखपुर में शुभांशु के घर में जश्न का माहौल है। उनकी मां की आंखें नम थीं लेकिन मुस्कान गर्व से भरी—
“जब बचपन में शुभांशु चांद की तस्वीरें किताब में देखता था, तो कहता था- ‘मां, एक दिन वहां जाऊंगा।’ आज वो वहां से भी आगे निकल गया।”
आने वाले 6 महीने कैसे रहेंगे शुभांशु के लिए?
- हर दिन 10 घंटे की रिसर्च
- हर क्रिया पर रिपोर्टिंग — खाना, नींद, मूवमेंट तक
- सप्ताह में 2 बार पृथ्वी से लाइव सेशन
- और हर दिन ज़ीरो ग्रैविटी में जीने का संघर्ष
