छत्तीसगढ़ में समाज कल्याण विभाग से जुड़ा एनजीओ घोटाला अब बड़े स्तर पर उजागर हो चुका है। इस घोटाले की जांच का जिम्मा अब केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) ने अपने हाथों में ले लिया है। बताया जा रहा है कि यह घोटाला करीब 14 वर्षों तक चलता रहा, जिसमें दिव्यांगजनों के कल्याण के नाम पर करोड़ों रुपए की सरकारी राशि का दुरुपयोग किया गया।
जांच में सामने आया है कि वर्ष 2004 में तत्कालीन समाज कल्याण मंत्री रेनूका सिंह, रिटायर्ड IAS विवेक ढांढ, एम.के. रावत, डॉ. आलोक शुक्ला, सुनील कुजूर, बी.एल. अग्रवाल, सतीश पांडे और पी.पी. श्रीवास्तव ने मिलकर दो एनजीओ बनाए थे। इन संस्थाओं में राज्य प्रशासनिक सेवा (RAS) के छह अधिकारी भी शामिल थे। इन एनजीओ का उद्देश्य दिव्यांगजनों की मदद करना बताया गया था। योजनाओं में सुनने की मशीनें, ट्राइसाइकिल, व्हीलचेयर, कैलिपर और कृत्रिम अंगों का वितरण शामिल था।
लेकिन जांच में यह पाया गया कि इन योजनाओं की गतिविधियां केवल कागज़ों तक सीमित थीं। ज़मीन पर कोई वास्तविक कार्य नहीं हुआ। इसके बावजूद, केंद्र और राज्य सरकार की योजनाओं से करोड़ों रुपए इन एनजीओ के खातों में स्थानांतरित होते रहे। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि इन संस्थाओं को समाज कल्याण विभाग से कोई मान्यता प्राप्त नहीं थी।
CBI की टीम ने हाल ही में मना स्थित समाज कल्याण विभाग के कार्यालय में पहुंचकर कई अहम दस्तावेज जब्त किए हैं। डिप्टी डायरेक्टर से एनजीओ से जुड़ी फाइलें मांगी गईं और तीन बंडल दस्तावेजों की फोटोकॉपी लेकर जांच के लिए सुरक्षित की गई। अधिकारियों के अनुसार, दस्तावेजों की गहन जांच के बाद आगे की कार्रवाई की जाएगी।
प्रारंभिक जांच में एक पूर्व मंत्री, सात IAS अधिकारियों और छह राज्य प्रशासनिक सेवा अधिकारियों के नाम सामने आए हैं। माना जा रहा है कि इन सभी पर वित्तीय अनियमितताओं और योजनाओं में गड़बड़ी के आरोप साबित हो सकते हैं।
यह मामला अब छत्तीसगढ़ के सबसे बड़े सामाजिक घोटालों में से एक माना जा रहा है। सीबीआई की जांच से उम्मीद है कि सच्चाई सामने आएगी और दोषियों पर सख्त कार्रवाई होगी।
