छत्तीसगढ़ के बिलासपुर से एक बड़ा मामला सामने आया है, जिसने जेल प्रशासन की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। अंबिकापुर सेंट्रल जेल से फरार हत्या के दोषी और आजीवन कारावास की सजा काट रहे बंदी मुकेश कांत ने आठ महीने बाद बिलासपुर कलेक्टर कार्यालय में आत्मसमर्पण कर दिया है। फरवरी 2025 में इलाज के लिए अस्पताल ले जाते समय वह पुलिस की निगरानी से भाग निकला था और तब से फरार चल रहा था। लगातार पुलिस और जेल प्रशासन की कोशिशों के बावजूद उसका कोई पता नहीं चल सका था।
आत्मसमर्पण करते हुए मुकेश कांत ने कलेक्टर के समक्ष न केवल खुद को पेश किया बल्कि अंबिकापुर जेल के अधिकारियों और कर्मचारियों पर रिश्वतखोरी, मानसिक और शारीरिक प्रताड़ना के गंभीर आरोप भी लगाए। उसने आरोप लगाया कि जेल के अंदर बंदियों से जबरन पैसों की वसूली की जाती है, और जो पैसे नहीं देते, उन्हें यातनाएं दी जाती हैं। मुकेश के अनुसार, उस पर भी बार-बार उसके परिवार से पैसे मंगवाने का दबाव बनाया गया, और विरोध करने पर उसके साथ दुर्व्यवहार और धमकियां दी गईं।
बंदी ने अपनी शिकायत में यह भी कहा कि जेल के भीतर मानवाधिकारों का गंभीर उल्लंघन होता है। उसने जेल अधिकारियों के खिलाफ लिखित शिकायत पत्र सौंपते हुए ट्रांजेक्शन डिटेल्स भी प्रस्तुत की हैं, जिनमें कथित रूप से जेल कर्मचारियों या उनके परिजनों के खातों में भेजी गई रकम का उल्लेख है। मुकेश ने अनुरोध किया है कि उसे बिलासपुर सेंट्रल जेल में ट्रांसफर किया जाए, ताकि वह निष्पक्ष माहौल में अपनी सजा काट सके।
जैसे ही आत्मसमर्पण की सूचना मिली, पुलिस और जेल विभाग के अधिकारी मौके पर पहुंचे और मुकेश को हिरासत में लेकर पूछताछ शुरू की। हालांकि, अंबिकापुर जेल प्रशासन ने अब तक इस पूरे मामले पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं दी है।
इस घटना ने जेल प्रशासन की पारदर्शिता, कैदियों के अधिकारों और भ्रष्टाचार की स्थिति पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। मामले की गंभीरता को देखते हुए संभावना जताई जा रही है कि उच्च स्तर पर जांच के आदेश दिए जा सकते हैं। यह मामला न केवल जेल व्यवस्था में सुधार की आवश्यकता को दर्शाता है बल्कि कैदियों के मानवाधिकारों की सुरक्षा को लेकर भी नई बहस छेड़ता है।
