छत्तीसगढ़ के बहुचर्चित शराब घोटाले मामले में सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को एक बड़ा आदेश देते हुए प्रवर्तन निदेशालय (ED) से 10 दिनों के भीतर जवाब मांगा है। यह निर्देश पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के बेटे चैतन्य बघेल की उस याचिका पर दिया गया है, जिसमें उन्होंने अपनी गिरफ्तारी को गैरकानूनी और प्रक्रिया-विरोधी बताते हुए चुनौती दी है।
चैतन्य बघेल ने सुप्रीम कोर्ट में दो याचिकाएं दायर की हैं—पहली में ईडी द्वारा की गई गिरफ्तारी को अवैध ठहराने की मांग की गई है, जबकि दूसरी में प्रिवेंशन ऑफ मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट (PMLA) की धारा 50 और 63 की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी गई है। इन धाराओं को बघेल पक्ष ने मौलिक अधिकारों के उल्लंघन के रूप में बताया है।
सुनवाई के दौरान जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस ज्योतमाला बागची की बेंच ने ईडी को नोटिस जारी करते हुए कहा कि एजेंसी यह स्पष्ट करे कि गिरफ्तारी किन कानूनी और वास्तविक आधारों पर की गई। कोर्ट ने यह भी कहा कि “सिर्फ असहयोग गिरफ्तारी का आधार नहीं हो सकता, एजेंसी को अपने कदम का ठोस कारण बताना होगा।”
चैतन्य बघेल की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने अदालत में कहा कि ईडी ने उनके मुवक्किल को बिना नोटिस बुलाए ही गिरफ्तार कर लिया, जो PMLA की धारा 19 का उल्लंघन है। उन्होंने कहा कि किसी भी गिरफ्तारी से पहले एजेंसी को नोटिस जारी करना जरूरी है, परंतु ऐसा नहीं किया गया। सिब्बल ने दलील दी कि ईडी इस मामले में प्रक्रिया का पालन न कर सीधे गिरफ्तारी कर रही है।
वहीं ईडी की ओर से एडिशनल सॉलिसिटर जनरल एस.वी. राजू ने अदालत को बताया कि जांच के लिए एजेंसी को तीन महीने का समय दिया गया था और उसी अवधि में कार्रवाई की गई। कोर्ट ने हालांकि ईडी से कहा कि वह दस दिनों में लिखित जवाब (काउंटर एफिडेविट) दाखिल करे ताकि मामले की अगली सुनवाई तय की जा सके।
बघेल पक्ष के वकील हरिहरन ने कहा कि ईडी की जांच बिना ठोस सबूतों के लगातार लंबी खिंच रही है और गिरफ्तारी केवल राजनीतिक प्रतिशोध का परिणाम है। उन्होंने कहा कि एजेंसी ने न तो कोई समन जारी किया, न ही कोई नोटिस भेजा, फिर भी गिरफ्तारी की गई — जो कानून की प्रक्रिया के खिलाफ है।
मामले की पृष्ठभूमि में देखा जाए तो छत्तीसगढ़ शराब घोटाला राज्य के इतिहास का सबसे बड़ा आर्थिक घोटाला माना जा रहा है। भूपेश बघेल सरकार के कार्यकाल में लगभग 2000 करोड़ रुपये के कथित घोटाले का खुलासा हुआ था। आरोप है कि 2019 से 2022 के बीच सरकारी अधिकारियों, राजनेताओं और निजी शराब ठेकेदारों ने मिलकर अवैध वसूली और मनी लॉन्ड्रिंग की।
ईडी का दावा है कि घोटाले से जुड़ी रकम को शेल कंपनियों और रियल एस्टेट निवेशों के जरिए सफेद किया गया। वहीं चैतन्य बघेल पर आरोप है कि उन्होंने इन कंपनियों में निवेश से लाभ उठाया। हालांकि, बचाव पक्ष का कहना है कि चैतन्य का इन लेनदेन से कोई प्रत्यक्ष संबंध नहीं है और उन्हें केवल राजनीतिक दबाव में फंसाया जा रहा है।
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में कहा कि “गिरफ्तारी केवल असहयोग के आधार पर नहीं हो सकती” और एजेंसी को यह साबित करना होगा कि गिरफ्तारी के लिए ठोस कानूनी कारण थे। कोर्ट ने यह भी संकेत दिया कि अगली सुनवाई में यह तय होगा कि चैतन्य बघेल की गिरफ्तारी वैध थी या नहीं।
