July 23, 2026
The Defence
बड़ी खबर

जज पर रिश्वत के गंभीर आरोप, 15 लाख रुपए में मनचाहा फैसला तय करने का मामला ।

महाराष्ट्र की राजधानी मुंबई में एक चौंकाने वाला रिश्वतकांड सामने आया है, जहाँ एक अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश (Additional Sessions Judge) पर मनचाहा फैसला सुनाने के लिए ₹15 लाख रिश्वत लेने के आरोप लगे हैं। इस मामले में Anti-Corruption Bureau (ACB) ने अदालत के एक लिपिक (Court Clerk) को रंगे-हाथ पकड़ा है, जबकि न्यायाधीश का नाम प्राथमिकी (FIR) में दर्ज किया गया है।

मामला एक विवादित संपत्ति के स्वामित्व से जुड़ा है, जिसमें शिकायतकर्ता पक्ष की पत्नी की कंपनी के नाम पर जमीन थी। इस संपत्ति पर एक कारोबारी समूह ने कब्जा करने की कोशिश की थी। मामले की सुनवाई पहले बॉम्बे हाईकोर्ट में चल रही थी, जिसने तीसरे पक्ष को किसी भी निर्माण या ट्रांजैक्शन से रोकने का आदेश दिया था। बाद में जमीन का मूल्यांकन ₹10 करोड़ से कम पाया गया, जिसके चलते केस को सत्र न्यायालय (Sessions Court) में स्थानांतरित कर दिया गया।

कैसे हुआ रिश्वत का सौदा

जांच के अनुसार, अदालत के लिपिक ने शिकायतकर्ता से कहा कि अगर वह मामले में अनुकूल आदेश चाहता है तो ₹25 लाख की राशि देनी होगी — जिसमें से ₹10 लाख खुद के लिए और ₹15 लाख संबंधित न्यायाधीश के लिए होंगे। शिकायतकर्ता ने इस मांग की जानकारी एसीबी को दी। एसीबी ने जाल बिछाया और निगरानी शुरू की।

कई दिनों की बातचीत के बाद सौदा घटाकर ₹15 लाख में तय हुआ। तय दिन लिपिक ने पैसे स्वीकार किए और तुरंत फोन पर न्यायाधीश को कॉल कर यह जानकारी दी कि राशि मिल गई है। एसीबी टीम, जो आसपास निगरानी में थी, ने मौके पर पहुंचकर लिपिक को रंगे हाथों पकड़ लिया।

जांच और कार्रवाई

ACB की टीम ने पकड़े गए लिपिक के बयान और कॉल रिकॉर्डिंग के आधार पर न्यायाधीश का नाम भी प्राथमिकी में दर्ज किया। जांच में यह भी सामने आया कि आरोपी लिपिक और न्यायाधीश के बीच संपर्क और समन्वय लगातार बना हुआ था। लिपिक ने कबूल किया कि वह न्यायाधीश के कहने पर ही रकम की डील कर रहा था।

वर्तमान में, अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश ईजाजुद्दीन सलाउद्दीन काज़ी (Ejazuddin Salauddin Kazi) को आरोपी बनाया गया है। अधिकारी अब तक गिरफ्तारी से बाहर हैं, लेकिन एसीबी ने उन्हें “वांछित” श्रेणी में रखा है और जल्द पूछताछ की तैयारी चल रही है।

कानूनी स्थिति और संभावित कार्रवाई

इस प्रकरण में भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम (Prevention of Corruption Act), 1988 की धाराओं के तहत मामला दर्ज हुआ है। यदि आरोप सिद्ध होते हैं, तो दोषी पाए जाने पर कम से कम चार वर्ष से लेकर अधिकतम दस वर्ष तक की सजा का प्रावधान है।

एसीबी सूत्रों के मुताबिक, फॉरेन्सिक जांच, मोबाइल कॉल रिकॉर्ड्स और बैंक ट्रांजैक्शनों की भी पड़ताल की जा रही है। लिपिक द्वारा इस्तेमाल किए गए फोन को जब्त कर उसकी डिजिटल जांच शुरू हो चुकी है।

बड़ी बात

इस मामले ने न्यायपालिका की साख पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। न्यायिक प्रक्रिया में निष्पक्षता की भावना को आघात पहुंचा है, और न्यायिक कर्मचारियों की भूमिका पर फिर एक बार बहस शुरू हो गई है।
ACB अधिकारियों का कहना है कि यह कार्रवाई “न्याय व्यवस्था में पारदर्शिता और ईमानदारी” बनाए रखने की दिशा में एक अहम कदम है।

Related posts

अल-फलाह यूनिवर्सिटी के फाउंडर 13 दिन की ED कस्टडी में; फर्जी UGC–NAAC मान्यता और मनी लॉन्ड्रिंग के आरोपों की जांच तेज

admin

गुकेश बना कार्लसन का काल: शतरंज की दुनिया में हड़कंप, वर्ल्ड नंबर-1 को दी करारी मात

admin

दिसंबर में पटरी पर दौड़ेगी पहली वंदे भारत स्लीपर ट्रेन, रेट्रोफिटिंग के बाद मिलेगी हरी झंडी

admin

Leave a Comment