राजधानी दिल्ली के ऐतिहासिक रामलीला मैदान में रविवार को कांग्रेस की ‘वोट चोरी गद्दी छोड़ो’ रैली आयोजित की जा रही है। इस रैली के जरिए कांग्रेस ने चुनाव प्रक्रिया में कथित अनियमितताओं और चुनाव आयोग की भूमिका को लेकर केंद्र सरकार पर सीधा हमला बोला है। देशभर से कांग्रेस कार्यकर्ता सुबह से ही रामलीला मैदान पहुंचने लगे हैं, जिससे इलाके में राजनीतिक हलचल तेज हो गई है।
कांग्रेस का आरोप है कि हालिया चुनावों में बड़े पैमाने पर वोटर लिस्ट में गड़बड़ियां की गईं, चुनावी प्रक्रिया की पारदर्शिता प्रभावित हुई और संवैधानिक संस्थाओं पर दबाव बनाया गया। पार्टी नेताओं का दावा है कि चुनाव आयोग, ईडी, सीबीआई, आयकर विभाग जैसी संस्थाओं का दुरुपयोग कर लोकतांत्रिक व्यवस्था को कमजोर किया जा रहा है।
रैली में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे और पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी के शामिल होने की संभावना है। इसके अलावा महासचिव प्रियंका गांधी, संगठन महासचिव केसी वेणुगोपाल, जयराम रमेश, सचिन पायलट सहित कई वरिष्ठ नेता मंच साझा कर सकते हैं। कांग्रेस सूत्रों के अनुसार, सभी नेता पहले पार्टी मुख्यालय इंदिरा भवन में एकत्र होंगे और फिर रामलीला मैदान पहुंचेंगे।
कांग्रेस ने इस आंदोलन के तहत तीन प्रमुख मांगें रखी हैं। पार्टी का कहना है कि मशीन-रीडेबल वोटर लिस्ट सभी राजनीतिक दलों को चुनाव से कम से कम एक महीने पहले उपलब्ध कराई जाए। साथ ही, चुनाव के बाद ईवीएम देखने की अनुमति दी जाए और सीसीटीवी फुटेज को समय से पहले नष्ट करने के नियमों में बदलाव किया जाए। कांग्रेस का दावा है कि वोट चोरी लोकतंत्र के लिए सबसे बड़ा खतरा है और सरकार चुनाव सुधार नहीं चाहती।
इसके अलावा कांग्रेस नेताओं ने चुनाव आयोग की नियुक्ति प्रक्रिया पर भी सवाल खड़े किए हैं। पार्टी ने पूछा है कि चुनाव आयुक्त की नियुक्ति से मुख्य न्यायाधीश की भूमिका क्यों हटाई गई और दिसंबर 2023 में ऐसा कौन सा कानून बदला गया, जिससे आयोग की जवाबदेही कमजोर हुई। राहुल गांधी पहले भी संसद और प्रेस कॉन्फ्रेंस के जरिए इन मुद्दों को उठा चुके हैं।
कांग्रेस का कहना है कि रैली के बाद राष्ट्रपति से मुलाकात कर करीब 5.5 करोड़ हस्ताक्षरों वाला ज्ञापन सौंपने का अनुरोध किया जाएगा। पार्टी नेताओं का दावा है कि यह आंदोलन केवल कांग्रेस का नहीं, बल्कि लोकतंत्र और निष्पक्ष चुनाव की रक्षा का अभियान है। वहीं, सत्तापक्ष ने कांग्रेस के आरोपों को बेबुनियाद बताते हुए इसे राजनीतिक ड्रामा करार दिया है।
कुल मिलाकर, दिल्ली की यह रैली आने वाले दिनों में चुनाव सुधार और संवैधानिक संस्थाओं की भूमिका को लेकर राजनीतिक बहस को और तेज करने वाली मानी जा रही है।
