April 17, 2026
The Defence
छत्तीसगढ़

विश्व पुस्तक मेला-2026 में साहित्यिक चेतना का उत्सव: ‘प्रत्याघात’ के जरिए न्याय, सत्य और संवेदना की पड़ताल

रायपुर विश्व पुस्तक मेला-2026 के मंच पर हिंदी साहित्य को एक सशक्त और विचारोत्तेजक कृति के रूप में उपन्यास ‘प्रत्याघात’ प्राप्त हुआ। भारत मंडपम, नई दिल्ली में आयोजित इस भव्य आयोजन में प्रसिद्ध लेखिका चित्रा मुद्गल द्वारा वरिष्ठ पत्रकार-लेखक ब्रह्मवीर सिंह के उपन्यास का लोकार्पण किया गया। यह कृति केवल एक साहित्यिक प्रस्तुति नहीं, बल्कि समकालीन समाज में सत्य, न्याय और नैतिक संघर्ष की गूढ़ अभिव्यक्ति बनकर सामने आई।

‘प्रत्याघात’ ब्रह्मवीर सिंह की चर्चित कृति ‘बूत मरते नहीं’ का अगला भाग है, जो उसी वैचारिक और कथात्मक यात्रा को आगे बढ़ाता है। उपन्यास उन प्रश्नों से मुठभेड़ करता है, जो पहले भाग में अधूरे रह गए थे—क्या असत्य की जीत स्थायी हो सकती है, और क्या न्याय अंततः अपना मार्ग खोज लेता है? लेखक इन सवालों को मानवीय पीड़ा, अवसाद, टूटन और आशा के माध्यम से पाठकों के सामने रखता है।

लोकार्पण समारोह में साहित्य, पत्रकारिता और बौद्धिक जगत की कई प्रतिष्ठित हस्तियां मौजूद रहीं। वक्ताओं ने उपन्यास की भाषा, संवेदना और वैचारिक गहराई की सराहना करते हुए कहा कि इसकी पंक्तियां पढ़ते समय ऐसा प्रतीत होता है मानो लेखक मुक्तिबोध की वैचारिक धरती से निकलकर आज के समाज से संवाद कर रहा हो। यह रचना पत्रकारिता के अनुभवों से उपजी हुई लगती है, जिसमें जीवन के यथार्थ को बिना अलंकरण के प्रस्तुत किया गया है।

लेखक ब्रह्मवीर सिंह ने अपने वक्तव्य में कहा कि ‘प्रत्याघात’ न्याय की खोज का साहित्यिक प्रयास है। यह उन सभी लोगों की कहानी है, जो असत्य की जीत से टूट गए थे, लेकिन भीतर कहीं न कहीं सत्य के पक्ष में खड़े रहने की इच्छा अब भी जीवित है। उपन्यास यह संदेश देता है कि टूटे हुए लोग मिटते नहीं, बल्कि समय आने पर प्रतिरोध का स्वर बन जाते हैं।

कार्यक्रम के दौरान मोबाइल फोन से दूरी बनाकर पुस्तकों से जुड़ने की अपील भी की गई। वक्ताओं ने कहा कि आज के यांत्रिक और निरस होते समाज में साहित्य ही जीवन का रस और संवेदना बचा सकता है। ‘प्रत्याघात’ इसी दिशा में एक सशक्त हस्तक्षेप है, जो पाठक को सोचने, ठहरने और आत्ममंथन के लिए विवश करता है।

कुल मिलाकर, ‘प्रत्याघात’ केवल एक उपन्यास नहीं, बल्कि वर्तमान समय की नैतिक और सामाजिक चुनौतियों पर एक गंभीर विमर्श है। विश्व पुस्तक मेला-2026 में इसका लोकार्पण हिंदी साहित्य के लिए एक महत्वपूर्ण क्षण बनकर उभरा, जिसने पाठकों को फिर से किताबों की ओर लौटने का मजबूत कारण दिया।

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