प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का त्रिनिदाद और टोबैगो दौरा भारतीय प्रवासियों के लिए न केवल भावनात्मक जुड़ाव का अवसर था, बल्कि यह भारत की सांस्कृतिक जड़ों की मजबूती और वैश्विक पहचान की गवाही भी देता है। अपने संबोधन में प्रधानमंत्री मोदी ने भारतीय प्रवासी समुदाय की सराहना करते हुए कहा – “आपने अपनी मिट्टी छोड़ी, लेकिन अपने संस्कार नहीं छोड़े। आप गंगा-यमुना पीछे छोड़ आए, लेकिन रामायण को दिल में लेकर आए।
🔹 प्रवासी भारतीयों का योगदान:
मोदी ने स्पष्ट रूप से कहा कि जो भारतीय त्रिनिदाद आए, वे केवल कामगार नहीं थे, बल्कि भारत की महान सभ्यता और संस्कृति के “दूत” थे। यह कथन प्रवासियों के उस ऐतिहासिक संघर्ष को उजागर करता है जब वे गिरमिटिया मजदूर के रूप में विदेश गए, लेकिन उन्होंने अपने त्योहार, भाषा, पूजा-पद्धति और परंपराएं जिंदा रखीं। त्रिनिदाद में आज भी रामलीला, जन्माष्टमी, नवरात्रि जैसे त्योहार पारंपरिक रूप से मनाए जाते हैं।
🔹 दिलों में बसी रामायण:
प्रधानमंत्री ने अपने संबोधन में बताया कि कैसे अयोध्या में श्रीराम मंदिर निर्माण को लेकर भारतीय प्रवासियों ने अपने भावनात्मक जुड़ाव को दर्शाया। उन्होंने त्रिनिदाद के लोगों द्वारा राम मंदिर के लिए पवित्र जल और शिलाएं भेजने का उल्लेख किया और इसकी सराहना करते हुए बदले में सरयू नदी का पवित्र जल और राम मंदिर की प्रतिकृति उन्हें भेंट की। इससे यह स्पष्ट होता है कि भारत और प्रवासी भारतीयों के बीच रिश्ता सिर्फ भौगोलिक नहीं, बल्कि आत्मिक और सांस्कृतिक भी है।
🔹 संस्कृति का निरंतर प्रवाह:
प्रधानमंत्री मोदी ने यह भी उल्लेख किया कि कैसे त्रिनिदाद की गलियों में आज भी “बनारस रोड”, “पटना स्ट्रीट” और “दिल्ली स्ट्रीट” जैसे नाम जीवित हैं। यह संकेत करता है कि भारतीय प्रवासियों ने जिस भी देश में कदम रखा, उन्होंने वहां भारत की खुशबू, भाषा और विचार धारा को भी स्थापित किया।
🔹 नई पीढ़ी को भारत से जोड़ने की पहल:
प्रधानमंत्री ने एक महत्वपूर्ण घोषणा करते हुए कहा कि प्रवासी भारतीयों की छठी पीढ़ी को भी अब ओवरसीज सिटिजन ऑफ इंडिया (OCI) कार्ड मिलेगा। यह पहल भारत और उसकी संतानों के बीच भावनात्मक एवं कानूनी रिश्ता और मजबूत करेगी।
