न्याय, दया और अंतरराष्ट्रीय संबंधों के बीच एक बेहद संवेदनशील और मानवीय मामला सामने आया है – भारतीय नर्स निमिषा प्रिया को यमन में 16 जुलाई 2025 को फांसी दी जानी है। इस खबर ने पूरे देश और खासकर केरल में चिंता की लहर फैला दी है। निमिषा पर अपने यमनी सहयोगी की हत्या का आरोप है और वह 2017 से यमन की जेल में बंद हैं। यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि मानवीय और कूटनीतिक दृष्टिकोण से भी अत्यंत महत्वपूर्ण है।
घटना का विवरण
निमिषा प्रिया, केरल की रहने वाली एक नर्स हैं, जो 2008 में नौकरी के सिलसिले में यमन गई थीं। वहां उन्होंने एक स्थानीय नागरिक तलाल अब्दो महदी के साथ मिलकर स्वास्थ्य क्लिनिक की शुरुआत की। लेकिन समय के साथ दोनों के संबंध बिगड़ते गए। महदी पर आरोप है कि उसने निमिषा का पासपोर्ट जब्त कर लिया और उन्हें शारीरिक व मानसिक प्रताड़ना देने लगा।
बताया जाता है कि 2017 में निमिषा ने महदी को नींद की दवा देकर बेहोश किया, ताकि वह अपना पासपोर्ट वापस ले सकें, लेकिन ओवरडोज़ से उसकी मौत हो गई। इसके बाद निमिषा को गिरफ्तार किया गया और यमन की अदालत ने उन्हें हत्या का दोषी ठहराकर फांसी की सजा सुनाई। इस फैसले को यमन के सुप्रीम कोर्ट और राष्ट्रपति रशाद अल-अलिमी ने भी मंजूरी दे दी।
कानूनी प्रक्रिया और ‘ब्लड मनी’ का विकल्प
यमन का कानून इस्लामी शरीयत पर आधारित है, जिसमें हत्या के मामलों में यदि मृतक का परिवार चाहे तो दोषी को माफ कर सकता है, बशर्ते कि वह एक तय राशि, जिसे ‘दिय्यत’ या ब्लड मनी कहते हैं, अदा करे।
निमिषा की माँ प्रेमा कुमारी और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने करीब 1 मिलियन अमेरिकी डॉलर (लगभग 8.3 करोड़ रुपये) बतौर मुआवज़ा देने की पेशकश की है, लेकिन मृतक का परिवार अब तक समझौते को तैयार नहीं हुआ है। समय कम है और यह माफी ही अब एकमात्र रास्ता बचा है जिससे निमिषा की जान बच सकती है।
भारत सरकार और सामाजिक संस्थाओं की भूमिका
भारत सरकार का विदेश मंत्रालय लगातार यमन सरकार और होथी विद्रोहियों से संपर्क बनाए हुए है, लेकिन यमन में मौजूदा राजनीतिक अस्थिरता और भारत का वहां दूतावास न होना बड़ी बाधा है।
वहीं “सेव निमिषा प्रिया एक्शन काउंसिल” नामक संस्था इस केस को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उठाने का प्रयास कर रही है। केरल में आम लोग भी इस मुद्दे पर जागरूकता फैला रहे हैं और फंडिंग अभियान चला रहे हैं।
मानवता बनाम कानून – क्या है रास्ता?
इस मामले में कई सवाल उठते हैं:
क्या यह पूरी तरह पूर्वनियोजित हत्या थी या आत्मरक्षा का प्रयास?
क्या न्यायिक प्रणाली में दया के लिए कोई स्थान नहीं है?
क्या अंतरराष्ट्रीय हस्तक्षेप से इस फांसी को रोका जा सकता है?
निमिषा की बेटी जो अब भारत में है, अपनी माँ से मिलने को तरस रही है। यह सिर्फ एक कैदी की कहानी नहीं, एक माँ, एक बेटी और एक परिवार के टूटने की त्रासदी है।
