राजनीति में बयानबाज़ी एक आम बात है, लेकिन जब कोई नेता किसी धर्म या उसकी विचारधारा पर सीधा सवाल उठाता है, तो मामला संवेदनशील हो जाता है। ऐसा ही एक विवाद हाल ही में तब सामने आया जब NCP (शरद गुट) के विधायक जितेंद्र आव्हाड ने सनातन धर्म को लेकर तीखा बयान दिया। उन्होंने कहा कि सनातन धर्म ने भारत को बर्बाद किया है और इसकी विचारधारा विकृत है।
आव्हाड ने यह भी दावा किया कि ‘सनातन’ नाम का कोई धर्म कभी था ही नहीं। उनका कहना है कि इस धर्म की आड़ में ऐतिहासिक रूप से सामाजिक भेदभाव को बढ़ावा दिया गया। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि डॉ. भीमराव अंबेडकर को सनातन धर्म के चलते न तो पानी पीने दिया गया और न ही स्कूल जाने की आज़ादी मिली। इसके अलावा उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि शिवाजी महाराज के राज्याभिषेक का भी सनातन धर्म के प्रतिनिधियों ने विरोध किया था।
आव्हाड का यह बयान राजनीतिक गलियारों और समाज में तीखी प्रतिक्रिया लेकर आया है। समर्थकों का तर्क है कि वे सामाजिक न्याय की बात कर रहे हैं, वहीं विरोधी पक्ष इसे सनातन धर्म और हिंदू संस्कृति पर सीधा हमला मान रहे हैं। सोशल मीडिया पर भी इस बयान को लेकर बहस तेज हो गई है।
इस पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर यह प्रश्न खड़ा कर दिया है कि नेताओं को अपने शब्दों के चयन में अधिक जिम्मेदारी दिखानी चाहिए। धार्मिक भावनाओं से जुड़े विषयों पर विचारपूर्वक और संतुलित रूप से बोलना न केवल समाज की एकता बनाए रखने के लिए ज़रूरी है, बल्कि यह लोकतांत्रिक मूल्यों का सम्मान भी है।
