देश की आर्थिक व्यवस्था को सबसे अधिक नुकसान वित्तीय अपराध और भ्रष्टाचार से होता है। हाल ही में छत्तीसगढ़ में हुए CGMSC रिएजेंट घोटाले ने इसका ताज़ा उदाहरण प्रस्तुत किया है। इस घोटाले में शामिल मोक्षित कॉर्पोरेशन और कई अधिकारियों पर गंभीर आरोप लगे हैं। मामला इतना बड़ा निकला कि इसमें EOW, ED और GST इंटेलिजेंस जैसी एजेंसियों को कार्रवाई करनी पड़ी।
घोटाले का खुलासा
इस घोटाले की शुरुआत राज्य आर्थिक अपराध अन्वेषण ब्यूरो (EOW) की जांच से हुई। जांच में सामने आया कि मोक्षित कॉर्पोरेशन ने स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों की मिलीभगत से टेंडर प्रक्रिया में हेराफेरी की। नकली दस्तावेजों और मनमाने दामों पर मेडिकल रिएजेंट और उपकरणों की सप्लाई की गई, जिससे सरकारी खजाने को करोड़ों रुपये का नुकसान हुआ।
ईडी और मनी लॉन्ड्रिंग मामला
EOW की रिपोर्ट के बाद प्रवर्तन निदेशालय (ED) भी सक्रिय हुआ। ईडी ने मामले को मनी लॉन्ड्रिंग से जोड़कर जांच शुरू की और पाया कि बड़े पैमाने पर फर्जी इनवॉइस तैयार कर पैसों की हेराफेरी की गई है।
जीएसटी इंटेलिजेंस की सख्ती
इसके बाद जीएसटी इंटेलिजेंस (DGGI) ने भी इस घोटाले की गहराई से जांच की। जांच में पता चला कि मोक्षित कॉर्पोरेशन और उससे जुड़ी लगभग 85 फर्मों ने मिलकर करीब 162.22 करोड़ रुपये की टैक्स वैल्यू पर 28.46 करोड़ रुपये का बेजा टैक्स क्रेडिट लिया। यह टैक्स चोरी और GST में गड़बड़ी का स्पष्ट मामला था। इस पर विभाग ने नोटिस जारी किया।
न्यायिक पहलू
मामले में मुख्य आरोपी और मोक्षित कॉर्पोरेशन के डायरेक्टर शशांक चोपड़ा को गिरफ्तार किया गया। उनकी जमानत याचिका पहले छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट और फिर सुप्रीम कोर्ट ने भी खारिज कर दी। सुप्रीम कोर्ट ने साफ संकेत दिया कि ऐसे गंभीर वित्तीय अपराधों में किसी भी तरह की रियायत नहीं दी जाएगी।
