छत्तीसगढ़ के एक प्रमुख जिले में नगर निगम दफ्तर में हुआ रिश्वत और कैश घोटाला अब खुलकर सामने आ गया है। यह मामला तब उजागर हुआ जब ठेकेदारों से वसूले जा रहे लाखों रुपये अचानक गायब हो गए और शक निगम कर्मचारियों पर गया। शुरू में ठेकेदारों पर ही उंगली उठाई गई, लेकिन उन्होंने अपनी सफाई देते हुए साफ कहा कि वे इस चोरी में शामिल नहीं हैं।
सूत्रों के अनुसार, निगम के कुछ विश्वसनीय अधिकारियों और ठेकेदारों ने मिलकर इस चोरी को पकड़ने के लिए योजना बनाई। इसके तहत कैश कलेक्शन करने वाले कर्मचारी के कमरे में एक गुप्त कैमरा लगाया गया। कुछ ही दिनों में सच्चाई सबके सामने आ गई—कैमरे में कैद हुआ कि पैसों की चोरी कोई बाहरी नहीं बल्कि निगम का ही एक स्टाफ कर रहा था, जिसने धीरे-धीरे करीब 6 लाख रुपये हड़प लिए।
मामला यहां तक तो सीमित था, लेकिन जैसे ही CCTV फुटेज की जानकारी निगम के बड़े अफसरों और कुछ राजनीतिक व्यक्तियों तक पहुंची, तो पूरे सिस्टम में हड़कंप मच गया। वजह यह थी कि कैमरों में न सिर्फ चोरी की हरकतें, बल्कि ठेकेदारों से कैश लेनदेन के वीडियो भी रिकॉर्ड हो चुके थे। यानी भ्रष्टाचार का असली चेहरा कैमरे में कैद हो गया था।
अब स्थिति यह है कि निगम अधिकारी खुद पुलिस में FIR दर्ज कराने से बच रहे हैं। बताया जा रहा है कि अधिकारी यह डर रहे हैं कि अगर CCTV फुटेज पुलिस को सौंपी गई, तो उनके अपने कारनामे भी उजागर हो जाएंगे। इसीलिए चोरी करने वाले कर्मचारी को पकड़ने के बाद भी मामले को दबाने की कोशिश की जा रही है।
कुल मिलाकर, यह प्रकरण छत्तीसगढ़ के प्रशासनिक ढांचे में फैले भ्रष्टाचार की गहराई को उजागर करता है। अधिकारियों ने अपने बचाव के लिए आरोपी कर्मचारी पर रिपोर्ट दर्ज न कराने का एहसान जताकर उससे चोरी का पैसा वापस लाने की कोशिश शुरू कर दी है। यह घटना न केवल सरकारी तंत्र की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाती है बल्कि यह भी दिखाती है कि जब निगरानी करने वाले ही बेईमानी में शामिल हों, तो सच्चाई को छिपाना असंभव नहीं, बल्कि शर्मनाक हो जाता है।
