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June 5, 2026
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छत्तीसगढ़

मेडिकल PG एडमिशन पर हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: पुरानी काउंसलिंग रद्द, नई प्रक्रिया से ही मिलेगा प्रवेश

छत्तीसगढ़ में मेडिकल कॉलेजों के पोस्ट ग्रेजुएट (PG) पाठ्यक्रमों में प्रवेश प्रक्रिया को लेकर चल रहे विवाद पर हाईकोर्ट ने एक अहम और दूरगामी प्रभाव वाला फैसला सुनाया है। इस निर्णय में अदालत ने स्पष्ट किया है कि पुराने अलॉटमेंट और पुरानी काउंसलिंग प्रक्रिया को अब मान्य नहीं माना जाएगा तथा मेडिकल PG की सीटें केवल नई काउंसलिंग प्रक्रिया के माध्यम से ही आवंटित की जाएंगी।

हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि यदि नियमों में बदलाव होता है, तो उसके अनुसार पहले किए गए एडमिशन स्वतः ही अमान्य माने जाएंगे। नियम 11 में किए गए संशोधन के बाद यह स्पष्ट हो गया कि किसी भी अभ्यर्थी को पहले से आवंटित सीट पर बने रहने का कोई अधिकार नहीं रह जाता। न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि प्रोविजनल (अस्थायी) अलॉटमेंट को अंतिम नहीं माना जा सकता, क्योंकि प्रवेश प्रक्रिया न्यायिक जांच और नियमों के अधीन होती है।

राज्य सरकार की ओर से अदालत को बताया गया कि काउंसलिंग रद्द करने का निर्णय मनमाना नहीं था, बल्कि यह सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के पालन में उठाया गया कदम था। सरकार ने यह भी स्पष्ट किया कि डोमिसाइल आधारित आरक्षण को मेडिकल PG पाठ्यक्रमों में असंवैधानिक माना गया है और केवल संस्थागत प्राथमिकता (Institutional Preference) को ही सीमित दायरे में अनुमति दी जा सकती है।

नियम 11 में किए गए संशोधन के अनुसार अब 50 प्रतिशत सीटें उन अभ्यर्थियों के लिए आरक्षित होंगी जिन्होंने छत्तीसगढ़ से एमबीबीएस किया है, जबकि शेष 50 प्रतिशत सीटें पूरी तरह से “ओपन मेरिट” के आधार पर भरी जाएंगी। इससे राज्य के बाहर के योग्य अभ्यर्थियों को भी समान अवसर मिल सकेगा और प्रवेश प्रक्रिया अधिक पारदर्शी एवं न्यायसंगत बनेगी।

हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने यह भी स्पष्ट किया कि इस मुद्दे पर अब कोई नई याचिका स्वीकार नहीं की जाएगी, जिससे प्रवेश प्रक्रिया में अनुशासन बना रहे और व्यवस्था को अंतिम रूप दिया जा सके। इस निर्णय के बाद राज्य में मेडिकल PG एडमिशन की पूरी प्रक्रिया नए नियमों के तहत नए सिरे से काउंसलिंग के माध्यम से शुरू की जाएगी।

यह फैसला न केवल वर्तमान विवाद का समाधान करता है, बल्कि भविष्य में मेडिकल शिक्षा में पारदर्शिता, समानता और न्याय सुनिश्चित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। इससे यह स्पष्ट संदेश जाता है कि शिक्षा से जुड़े मामलों में नियमों और न्यायिक निर्देशों से ऊपर कोई प्रक्रिया नहीं हो सकती।

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