छत्तीसगढ़ में “धर्म स्वतंत्रता विधेयक 2026” का पारित होना राज्य की कानून व्यवस्था और सामाजिक संतुलन के लिए एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। इस विधेयक का मुख्य उद्देश्य अवैध धर्मांतरण की घटनाओं पर रोक लगाना और ऐसे मामलों में पीड़ितों को न्याय दिलाना है। लंबे समय से यह मुद्दा चर्चा में था कि लालच, डर, दबाव या भ्रामक तरीकों से लोगों का धर्म परिवर्तन कराया जा रहा है, जिसे अब इस कानून के माध्यम से नियंत्रित करने का प्रयास किया गया है।
इस विधेयक के तहत यदि कोई व्यक्ति धन, नौकरी, मुफ्त शिक्षा या अन्य किसी प्रकार के प्रलोभन देकर धर्म परिवर्तन कराता है, तो इसे अपराध माना जाएगा। इसके अलावा, मानसिक दबाव, भय या बल प्रयोग करके धर्म परिवर्तन कराना भी कानूनन दंडनीय होगा। यहां तक कि डिजिटल माध्यमों के जरिए लोगों को प्रभावित कर धर्म बदलवाने के प्रयासों को भी इस कानून में शामिल किया गया है।
इस कानून की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि अब ऐसे अपराधों को संज्ञेय और गैर-जमानती बना दिया गया है। इसका मतलब है कि पुलिस बिना वारंट के कार्रवाई कर सकती है और आरोपी को आसानी से जमानत नहीं मिलेगी। इससे कानून की सख्ती और प्रभावशीलता दोनों बढ़ेंगी।
सजा के प्रावधान भी काफी कठोर रखे गए हैं। सामान्य मामलों में 7 से 10 साल तक की जेल और न्यूनतम 5 लाख रुपये जुर्माने का प्रावधान है। वहीं महिलाओं, नाबालिगों, अनुसूचित जाति-जनजाति और दिव्यांग व्यक्तियों के मामलों में सजा 10 से 20 साल तक हो सकती है। सामूहिक धर्मांतरण जैसे गंभीर मामलों में आजीवन कारावास और भारी जुर्माना भी तय किया गया है।
इसके साथ ही, सरकार ने न्यायिक प्रक्रिया को तेज करने के लिए प्रत्येक जिले में विशेष न्यायालय स्थापित करने और पीड़ितों के लिए विशेष लोक अभियोजक नियुक्त करने का प्रावधान भी किया है। इतना ही नहीं, दोषियों को पीड़ितों को आर्थिक मुआवजा देने के लिए भी बाध्य किया जाएगा, जिससे पीड़ितों को वास्तविक सहायता मिल सके।
इस विधेयक में यह भी स्पष्ट किया गया है कि यदि कोई व्यक्ति अपने मूल धर्म में वापस लौटता है, तो उसे धर्मांतरण नहीं माना जाएगा। यह प्रावधान कानून को संतुलित और व्यावहारिक बनाता है।
