77वें गणतंत्र दिवस के अवसर पर दिल्ली के कर्तव्यपथ पर आयोजित भव्य परेड में छत्तीसगढ़ की झांकी ने पूरे देश का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया। यह झांकी केवल सांस्कृतिक प्रस्तुति नहीं थी, बल्कि छत्तीसगढ़ के आदिवासी इतिहास, संघर्ष, बलिदान और गौरवशाली विरासत की जीवंत अभिव्यक्ति थी। इसके माध्यम से उन वीर नायकों को राष्ट्रीय मंच मिला, जिन्हें इतिहास में लंबे समय तक वह पहचान नहीं मिल सकी, जिसके वे वास्तविक हकदार थे।
झांकी के प्रमुख दृश्य में शहीद वीर नारायण सिंह को घोड़े पर सवार, हाथ में तलवार लिए हुए दर्शाया गया। यह दृश्य उनके साहस, नेतृत्व और बलिदान का प्रतीक था। 1856 के भीषण अकाल के दौरान गरीबों को अनाज बांटना और अंग्रेजी शासन के खिलाफ विद्रोह करना उनके जीवन का ऐतिहासिक अध्याय रहा। अंग्रेजों द्वारा उन्हें गिरफ्तार कर फांसी दी गई, लेकिन वे छत्तीसगढ़ के पहले शहीद के रूप में अमर हो गए। झांकी में उनका यह रूप जनमानस को उनके त्याग और संघर्ष की याद दिलाने वाला था।
झांकी के अग्रभाग में वीर गुंडाधुर की प्रतिमा स्थापित की गई, जो 1910 के ऐतिहासिक भूमकाल विद्रोह के नायक थे। उन्होंने अंग्रेजी शासन के खिलाफ आदिवासी समाज को संगठित कर सामूहिक चेतना को आवाज दी। भूमकाल का अर्थ ही अन्याय के खिलाफ संगठित विद्रोह है, और झांकी में आम के पत्तों की टहनियों तथा सूखी लाल मिर्च जैसे प्रतीकों के माध्यम से उस जन-आंदोलन और प्रतिरोध संस्कृति को दर्शाया गया, जिसने आदिवासी समाज को एकजुट किया।
झांकी का मध्य भाग डिजिटल आदिवासी संग्रहालय की अवधारणा पर आधारित था, जिसे आधुनिक तकनीक के माध्यम से प्रस्तुत किया गया। एलईडी विजुअल्स और डिजिटल माध्यमों से आदिवासी नायकों के जीवन, संघर्ष और बलिदान की गाथाओं को जीवंत रूप में दिखाया गया। यह केवल एक प्रस्तुति नहीं थी, बल्कि इतिहास को संरक्षित कर नई पीढ़ी तक पहुंचाने का एक सशक्त प्रयास था। यह पहल छत्तीसगढ़ सरकार की उस सोच का प्रतीक है, जिसके तहत आदिवासी इतिहास को डिजिटल माध्यमों से सुरक्षित कर भविष्य के लिए संजोया जा रहा है।
इस झांकी ने यह स्पष्ट कर दिया कि छत्तीसगढ़ केवल प्राकृतिक संसाधनों और सांस्कृतिक विविधता का राज्य नहीं है, बल्कि यह वीरता, संघर्ष और आत्मसम्मान की परंपरा से भी समृद्ध है। आदिवासी नायकों की गाथाएं केवल अतीत की कहानियाँ नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय, साहस और संघर्ष की प्रेरणास्रोत विरासत हैं।
