रायपुर, 16 फरवरी 2026। शिक्षा व्यवस्था से जुड़ा एक अहम मुद्दा इन दिनों देशभर में चर्चा का विषय बना हुआ है। सेवारत शिक्षकों के लिए टीईटी (शिक्षक पात्रता परीक्षा) की अनिवार्यता को समाप्त करने की मांग को लेकर शिक्षक संगठनों ने अपनी आवाज तेज कर दी है। उनका तर्क है कि वर्षों से सेवा दे रहे शिक्षकों पर दोबारा पात्रता परीक्षा का दबाव डालना न्यायसंगत नहीं है और इससे उनके मनोबल पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है।
शिक्षक संगठनों का कहना है कि शिक्षा का अधिकार अधिनियम 2009 के तहत टीईटी को अनिवार्य किए जाने से लाखों सेवारत शिक्षक प्रभावित हो रहे हैं। उनका मानना है कि जिन शिक्षकों ने लंबे समय से विद्यालयों में पढ़ाने का अनुभव हासिल किया है, उनके लिए पुनः परीक्षा की बाध्यता अनावश्यक है। इस नियम के कारण शिक्षकों में असंतोष और आक्रोश की स्थिति बनती जा रही है, जिससे शिक्षा व्यवस्था पर भी असर पड़ सकता है।
इस मुद्दे को लेकर छत्तीसगढ़ सहित विभिन्न राज्यों के शिक्षक संगठनों ने केंद्र सरकार को पत्र लिखकर हस्तक्षेप की मांग की है। पत्र में प्रधानमंत्री और केंद्रीय शिक्षा मंत्री से नियमों में संशोधन कर सेवारत शिक्षकों को राहत देने की अपील की गई है। संगठनों का कहना है कि शिक्षकों के अनुभव, सेवा अवधि और कार्यकुशलता को प्राथमिकता दी जानी चाहिए, न कि केवल परीक्षा के आधार पर उनकी योग्यता तय की जाए।
समग्र रूप से देखा जाए तो यह मुद्दा केवल परीक्षा की अनिवार्यता तक सीमित नहीं है, बल्कि शिक्षकों के सम्मान, मनोबल और शिक्षा की गुणवत्ता से भी जुड़ा हुआ है। यदि सरकार इस दिशा में संतुलित निर्णय लेती है, तो इससे न केवल शिक्षकों को राहत मिलेगी बल्कि शिक्षा व्यवस्था में स्थिरता और विश्वास भी मजबूत होगा।
