हाल ही में छत्तीसगढ़ में भाजपा और कांग्रेस द्वारा आयोजित कार्यक्रमों से ‘छत्तीसगढ़ महतारी’ की तस्वीरें अचानक गायब हो गई हैं, जो पहले चुनावों के दौरान बड़े गर्व और जोर-शोर से इस्तेमाल की जाती थीं। इस बदलाव ने राजनीतिक दर्शकों और विश्लेषकों का ध्यान आकर्षित किया है। साथ ही, मैनपाट के आयोजन में मुख्यमंत्री द्वारा मांदर बजाकर पारंपरिक नृत्य की प्रस्तुति और धक्का-मुक्की पर फूलोदेवी की प्रतिक्रिया ने एक नयी बहस छेड़ दी है।
‘छत्तीसगढ़ महतारी’ की अनुपस्थिति
चुनावी संदर्भ में, दोनों प्रमुख राजनीतिक दलों—भाजपा और कांग्रेस—ने ‘छत्तीसगढ़ महतारी’ के चित्रों को अपने कार्यक्रमों में बड़े उत्साह के साथ लगाना शुरू किया था, ताकि स्थानीय एवं सांस्कृतिक पहचान को उजागर किया जा सके। लेकिन अब, इन कार्यक्रमों में यह प्रतीक गायब हो गया है । इस बदलाव ने यह संकेत दिया है कि शायद अब चुनावी रणनीति का फोकस सांस्कृतिक प्रतीकों के बजाय व्यक्तिगत या क्षेत्रीय मुद्दों पर ज्यादा केंद्रित है।
मुख्यमंत्री का सांस्कृतिक उत्सव
मैनपाट कार्यक्रम में मुख्यमंत्री छत्तीसगढ़ी गाने पर मांदर बजा रहे थे और थिरकते दिखाई दे रहे थे, साथ ही मंत्री और विधायक भी उनके साथ नाचते हुए नजर आए । इस आयोजन को मीडिया और सोशल मीडिया चैनलों पर खूब कवर किया गया, जिससे छत्तीसगढ़ की पारंपरिक संस्कृति को एक राजनीतिक रंग मिल गया।
फूलोदेवी की नाराज़गी
कार्यक्रम के दौरान एंट्री में हुई धक्का-मुक्की को लेकर कांग्रेस नेता फूलोदेवी ने कड़ी निंदा की और इसे महिलाओं के प्रति असंवेदनशीलता बताया । उन्होंने कहा कि मंच पर इस तरह की घटनाएं स्वीकार्य नहीं हैं और इसकी जवाबदेही होनी चाहिए।
