राजस्थान की नंदिनी गुप्ता अब मिस वर्ल्ड 2024 की रेस में हैं। लेकिन जिस मंच पर वे उतरने जा रही हैं, उसका इतिहास विवादों से शुरू हुआ था। 1951 में पहली मिस वर्ल्ड प्रतियोगिता हुई तो वेटिकन चर्च ने इसे “धार्मिक मूल्यों के खिलाफ” बताया। वजह थी — बिकिनी पहनकर मंच पर उतरी महिलाएं।
तब से अब तक यह मंच सिर्फ सुंदरता नहीं, बल्कि ‘ब्यूटी विद पर्पज़’ यानी सामाजिक जिम्मेदारी के साथ सौंदर्य का प्रतीक बन चुका है।
विवादों से वैभव तक: मिस वर्ल्ड का 70 साल का सफर
-
1951 में ब्रिटेन में पहली मिस वर्ल्ड प्रतियोगिता आयोजित हुई थी।
-
महिलाओं ने बिकिनी पहनी, जिससे धार्मिक संगठनों ने विरोध किया।
-
आयोजकों पर अश्लीलता फैलाने का आरोप लगा।
-
बाद में फॉर्मेट बदला गया और अब यह प्रतियोगिता ग्लोबल लीडरशिप, सेवा और व्यक्तित्व की परीक्षा बन चुकी है।
भारत की चमक इस मंच पर कई बार नजर आई
-
1994: ऐश्वर्या राय बनीं मिस वर्ल्ड
-
2000: प्रियंका चोपड़ा ने ताज जीता
-
2023: नंदिनी गुप्ता बनीं मिस इंडिया वर्ल्ड
-
2024: भारत में ही हो रहा है मिस वर्ल्ड फिनाले, नंदिनी को होम ग्राउंड का फायदा मिलने की उम्मीद
नंदिनी का बयान:
“मेरा मकसद सिर्फ ग्लैमर नहीं, भारत की सोच और सेवा को दुनिया के सामने लाना है।”
अब क्या देखे जाते हैं मिस वर्ल्ड में?
-
सिर्फ लुक्स नहीं, कम्युनिकेशन स्किल, सोशल वर्क, एजुकेशन और विजन भी
-
हर प्रतिभागी को ‘ब्यूटी विद पर्पज़’ प्रोजेक्ट देना होता है — जैसे कि महिला सशक्तिकरण, बाल शिक्षा या पर्यावरण संरक्षण
इस बार भारत की उम्मीदें क्यों ज्यादा हैं?
-
आयोजन भारत में हो रहा है, जिससे देश की कंटेस्टेंट को मानसिक बढ़त मिल सकती है
-
नंदिनी की सोशल प्रोजेक्ट पर भी इंटरनेशनल जूरी ने रुचि दिखाई है
-
भारत की पिछली जीतों का ट्रैक रिकॉर्ड अच्छा रहा है
