भोपाल गैस त्रासदी भारत के औद्योगिक इतिहास की सबसे भयावह दुर्घटनाओं में से एक रही है। इस त्रासदी के बाद यूनियन कार्बाइड परिसर में जमा हुआ ज़हरीला कचरा आज भी न केवल पर्यावरण के लिए खतरा है, बल्कि हजारों लोगों के स्वास्थ्य पर भी गंभीर प्रभाव डाल रहा है।
हाल ही में जबलपुर हाईकोर्ट में इस मामले को लेकर सुनवाई हुई, जिसमें सरकारी वैज्ञानिक संस्थाएं जैसे नीरी, सीपीसीबी और एमपीपीसीबी कोर्ट के सवालों का संतोषजनक जवाब देने में असफल रहीं। अदालत ने सरकार को स्पष्ट निर्देश दिया कि वह भोपाल में मौजूद ज़हरीले कचरे और मर्करी को सुरक्षित स्थान पर लैंडफिल करने की योजना तैयार कर प्रस्तुत करे।
भोपाल गैस पीड़ित संघर्ष सहयोग समिति की संयोजक साधना कर्णिक ने बताया कि यूनियन कार्बाइड परिसर में अब भी लगभग एक टन मर्करी मौजूद है। समिति के वकील ने कोर्ट में यह दावा किया और इसके समर्थन में नीरी की 2010 की रिपोर्ट और यूनियन कार्बाइड के पूर्व कर्मचारी टी. आर. चौहान की किताब “भोपाल नरसंहार: एक सच्ची कहानी” से सबूत पेश किए। इन दस्तावेजों में ज़हरीले कचरे में भारी मात्रा में मर्करी होने की पुष्टि की गई थी।
चौंकाने वाली बात यह है कि इतने वर्षों बाद भी सरकार और वैज्ञानिक संस्थाएं इस कचरे के सुरक्षित निपटान के लिए ठोस कदम नहीं उठा सकीं। समिति ने यह भी आरोप लगाया कि नीरी और सीपीसीबी ने कोर्ट को गुमराह करने की कोशिश की और ज़हरीले कचरे की वास्तविक स्थिति को छिपाया।
इस पूरे मामले ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या हम अपने नागरिकों के स्वास्थ्य और पर्यावरण को लेकर गंभीर हैं? भोपाल त्रासदी सिर्फ एक हादसा नहीं, बल्कि एक चेतावनी है – जिसे नजरअंदाज करना भविष्य के लिए और भी खतरनाक साबित हो सकता है। अब समय आ गया है कि सरकार इस दिशा में ठोस और पारदर्शी कदम उठाए।
