छत्तीसगढ़ की राजनीति इस समय एक गंभीर संवैधानिक प्रश्न से गुजर रही है। हाल ही में राज्य में हुए मंत्रिमंडल विस्तार के बाद 13वें मंत्री की नियुक्ति को लेकर विवाद खड़ा हो गया है। इस मामले की सुनवाई बिलासपुर हाईकोर्ट में हुई, जहां दोनों पक्षों ने अपने-अपने तर्क रखे। अदालत ने याचिकाकर्ता से सुप्रीम कोर्ट में लंबित एक समान मामले की स्थिति रिपोर्ट पेश करने के लिए दो सप्ताह का समय दिया है।
मामला मूल रूप से संविधान के अनुच्छेद 164(1ए) से जुड़ा है। इस प्रावधान के अनुसार, किसी भी राज्य में मंत्रिपरिषद के सदस्यों की संख्या विधानसभा के कुल सदस्यों के 15 प्रतिशत से अधिक नहीं हो सकती। चूंकि छत्तीसगढ़ विधानसभा में 90 विधायक हैं, इसलिए मुख्यमंत्री सहित मंत्रियों की अधिकतम संख्या 13 ही हो सकती है। याचिकाकर्ता का कहना है कि 14वें मंत्री की नियुक्ति इस प्रावधान का उल्लंघन है और इसलिए इसे असंवैधानिक माना जाना चाहिए।
सरकार की ओर से यह दलील दी गई कि ऐसा ही एक मामला वर्ष 2020 में सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन था। उस समय भी मंत्रियों की संख्या को लेकर विवाद हुआ था और एन. पी. राजपति बनाम राज्य सरकार का उदाहरण पेश किया गया था। सरकार का कहना है कि हरियाणा विधानसभा में भी 90 सदस्य हैं और वहां 14 मंत्री कार्यरत हैं, इसलिए छत्तीसगढ़ में भी इस व्यवस्था को मान्य माना जाना चाहिए।
इतिहास पर नज़र डालें तो छत्तीसगढ़ में चाहे डॉ. रमन सिंह की सरकार रही हो या भूपेश बघेल का कार्यकाल, मंत्रिमंडल की संख्या मुख्यमंत्री को छोड़कर 12 मंत्रियों तक ही सीमित रही। वर्तमान मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय के कार्यकाल में भी शुरू में केवल 11 मंत्री थे, लेकिन अगस्त 2025 में हुए विस्तार के बाद तीन नए चेहरों को मंत्रिपरिषद में शामिल किया गया, जिससे संख्या बढ़कर 13 हो गई। यही निर्णय अब अदालत में चुनौती का कारण बना है।
यह मामला केवल मंत्रियों की संख्या का नहीं है, बल्कि यह संविधान की व्याख्या, राजनीतिक परंपराओं और न्यायिक दृष्टिकोण का भी परीक्षण है। अदालत का आगामी फैसला यह तय करेगा कि छत्तीसगढ़ में मंत्रिमंडल का ढांचा सख्ती से संवैधानिक सीमा में रहेगा या फिर राजनीतिक परिस्थितियों के अनुरूप लचीलापन दिखेगा।
