छत्तीसगढ़ की जेलों में बंदियों की मौत का मुद्दा विधानसभा में जोरदार तरीके से उठा, जिससे सदन का माहौल काफी गरम हो गया। प्रश्नकाल के दौरान विपक्ष ने राज्य की जेल व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े किए और सरकार से स्पष्ट तथा विस्तृत जवाब की मांग की। इस दौरान पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने जेलों में हुई मौतों, कैदियों की बढ़ती संख्या और कानून-व्यवस्था की स्थिति को लेकर सरकार को घेरते हुए कई अहम बिंदु उठाए।
उन्होंने सदन में पूछा कि बीते एक वर्ष में राज्य की विभिन्न जेलों में कुल कितनी मौतें हुई हैं और इन मौतों के पीछे क्या कारण रहे हैं। इसके साथ ही उन्होंने जेलों में क्षमता से अधिक बंदियों को रखे जाने की समस्या पर चिंता जताई। उनका आरोप था कि कई जेलों में निर्धारित क्षमता से लगभग 150 प्रतिशत अधिक कैदी रखे जा रहे हैं, जिससे स्वास्थ्य सुविधाओं, सुरक्षा व्यवस्था और मूलभूत संसाधनों पर दबाव बढ़ रहा है। उन्होंने यह भी कहा कि ऐसी परिस्थितियां कैदियों के जीवन के अधिकार पर सवाल खड़ा करती हैं।
विपक्ष ने कानून-व्यवस्था की स्थिति पर भी सरकार को घेरा। हत्या, लूट और फिरौती जैसे गंभीर अपराधों में कथित वृद्धि का उल्लेख करते हुए इसे प्रशासनिक विफलता बताया गया। विपक्ष का कहना था कि जेलों में बढ़ती भीड़ और बंदियों की मौतें राज्य की समग्र सुरक्षा व्यवस्था की कमजोरियों की ओर संकेत करती हैं, इसलिए इस मामले की स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच आवश्यक है। कुछ सदस्यों ने विधानसभा समिति से जांच कराने की मांग भी उठाई।
इन आरोपों के जवाब में उपमुख्यमंत्री एवं गृह विभाग का दायित्व संभाल रहे विजय शर्मा ने सदन में आधिकारिक आंकड़े प्रस्तुत किए। उन्होंने बताया कि जनवरी 2025 से जनवरी 2026 के बीच राज्य की जेलों में कुल 66 बंदियों की मौत दर्ज की गई है। उन्होंने यह भी आश्वस्त किया कि प्रत्येक मामले की नियमानुसार जांच की जा रही है और जहां भी लापरवाही पाई जाएगी, वहां सख्त कार्रवाई की जाएगी।
हालांकि जवाब के दौरान विपक्ष संतुष्ट नहीं दिखा और कुछ समय के लिए हंगामा भी हुआ। डिप्टी सीएम के कुछ बयानों पर असहमति जताते हुए विपक्षी सदस्यों ने वॉकआउट किया। इस पूरे घटनाक्रम ने स्पष्ट कर दिया कि जेल सुधार, कैदियों की सुरक्षा और पारदर्शिता जैसे मुद्दे आने वाले समय में भी राजनीतिक बहस के केंद्र में बने रहेंगे।
कुल मिलाकर, यह मामला केवल आंकड़ों का नहीं, बल्कि मानवाधिकार, प्रशासनिक जवाबदेही और राज्य की कानून-व्यवस्था से जुड़ा व्यापक विषय बन गया है। अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि सरकार इस दिशा में ठोस सुधारात्मक कदम उठाती है या नहीं।
