हाउसिंग लोन से जुड़ा यह घोटाला एक बार फिर सहकारी समितियों की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े करता है। करीब 26 साल पुराने इस मामले में आर्थिक अपराध शाखा (EOW) की कार्रवाई ने यह साबित कर दिया कि भले ही अपराध पुराना हो, लेकिन कानून की पकड़ से बचना आसान नहीं होता। जांच में सामने आया कि गृह-निर्माण सहकारी समिति के तत्कालीन अध्यक्ष और आवास-पर्यवेक्षक ने मिलकर एक संगठित तरीके से बड़े स्तर पर फर्जीवाड़ा किया।
इस घोटाले का मुख्य आधार था—फर्जी नामों पर लोन पास कराना। बताया जा रहा है कि कुल 186 लोगों के नाम पर लोन स्वीकृत किए गए, जबकि इनमें से कई नाम केवल कागजों तक ही सीमित थे। वास्तविकता में इन लोगों का अस्तित्व या तो संदिग्ध था या उनकी जानकारी के बिना उनके नाम का इस्तेमाल किया गया। इस तरह से सरकारी और बैंकिंग सिस्टम को गुमराह कर भारी रकम का दुरुपयोग किया गया।
जांच एजेंसियों ने पाया कि लोन प्रक्रिया में जानबूझकर नियमों की अनदेखी की गई। दस्तावेजों की जांच सही तरीके से नहीं की गई और कई मामलों में फर्जी कागजात के आधार पर ही लोन स्वीकृत कर दिए गए। यह पूरा खेल अंदरूनी मिलीभगत के बिना संभव नहीं था, जिससे यह साफ होता है कि सिस्टम के भीतर बैठे जिम्मेदार लोगों ने ही इस घोटाले को अंजाम दिया।
EOW की कार्रवाई के तहत अब मुख्य आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया गया है और उनसे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसी यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही है कि इस घोटाले में और कौन-कौन लोग शामिल थे तथा कितनी रकम का वास्तविक नुकसान हुआ। इस कार्रवाई के बाद अन्य संबंधित मामलों की भी जांच तेज होने की संभावना है।
यह मामला यह भी दर्शाता है कि सहकारी संस्थाओं में पारदर्शिता और जवाबदेही की कितनी आवश्यकता है। अगर समय रहते ऐसे मामलों पर सख्ती से निगरानी रखी जाती, तो शायद इतने बड़े घोटाले को रोका जा सकता था। अब देखना होगा कि आगे की जांच में क्या नए खुलासे सामने आते हैं और दोषियों को कितनी सख्त सजा मिलती है।
