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September 8, 2026
The Defence
छत्तीसगढ़

हाईकोर्ट ने कहा – ट्रांसफर प्रशासनिक प्रक्रिया का हिस्सा, दुर्भावना या नियमभंग नहीं तो अदालत नहीं करेगी दखल

छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने स्थानांतरण (ट्रांसफर) मामलों पर एक महत्वपूर्ण निर्णय सुनाते हुए यह स्पष्ट कर दिया है कि स्थानांतरण सेवा का अभिन्न अंग है, और इसमें अदालत का हस्तक्षेप केवल तभी संभव है जब आदेश में किसी प्रकार की दुर्भावना (malafide intent) या नियमों के उल्लंघन का प्रमाण हो।

यह मामला बिलासपुर जिले के जिला शिक्षा अधिकारी (DEO) कार्यालय में पदस्थ सहायक ग्रेड-2 कर्मचारी जितेंद्र कुमार से जुड़ा था। उन्हें प्रशासनिक आदेश के तहत मानिकचौरी (मस्तूरी) स्थानांतरित किया गया था। इस आदेश के खिलाफ उन्होंने हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी, जिसमें दावा किया गया था कि उनका ट्रांसफर न तो प्रशासनिक आवश्यकता पर आधारित है और न ही नियमों के अनुरूप।

याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि वे मूल रूप से स्कूल शिक्षा विभाग के अधीन कार्यरत हैं और जिला शिक्षा अधिकारी कार्यालय के नियमित कर्मचारी नहीं हैं। ऐसे में कलेक्टर या डीईओ को उनका स्थानांतरण करने का अधिकार नहीं है। उन्होंने यह भी बताया कि उनकी नियुक्ति वर्ष 1994 में सहायक ग्रेड-3 पद पर हुई थी और वर्ष 2008 में वे सहायक ग्रेड-2 के पद पर पदोन्नत हुए। वर्तमान में वे डीईओ कार्यालय बिलासपुर के विधि प्रकोष्ठ में लेखा परीक्षक के रूप में कार्यरत हैं।

वहीं, शासन की ओर से पेश अधिवक्ता ने अदालत को बताया कि ट्रांसफर आदेश प्रशासनिक आवश्यकता और जनहित को ध्यान में रखते हुए जारी किया गया है। किसी भी कर्मचारी को उसकी सेवा के दौरान सरकार या नियोक्ता द्वारा कार्य की आवश्यकता के अनुसार कहीं भी पदस्थ किया जा सकता है। यह राज्य का विशेषाधिकार (Prerogative) है, और अदालत को इसमें हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए जब तक कि कोई स्पष्ट दुर्भावना या नियमभंग सिद्ध न हो।

हाईकोर्ट ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद पाया कि ट्रांसफर आदेश में किसी भी प्रकार की दुर्भावना या नियमों का उल्लंघन नहीं हुआ है। अदालत ने कहा कि स्थानांतरण सेवा का नियमित और स्वाभाविक हिस्सा है, और इसमें न्यायालय की भूमिका सीमित है। अतः याचिका को खारिज कर दिया गया।

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